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खामोशियों का हिसाब

खामोशियों का हिसाब

अगर मैं कभी तुम्हारी दुनिया का हिस्सा थी,

तो यूँ बेआवाज़ चले जाना इतना आसान कैसे था?

मैंने तो हर लम्हा संभाल कर रखा,

उन यादों को भी… जिनकी परवाह शायद सिर्फ मुझे थी।

एक छोटे से पैगाम की उम्मीद में,

मैंने कई रातें आँखों में काट दीं—

पर तुम्हारी खामोशी ने कभी जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा।

तुम धीरे-धीरे दूर होते गए,

और मैं हर बार खुद को ही कसूरवार ठहराती रही।

मैं उस रिश्ते की वफादार रही,

जो कब का फीका पड़ चुका था—

पर दिल को ये सच कब मंज़ूर था?

मैं “हम” को बचाने में लगी रही,

जबकि तुमने “हम” को छोड़ना कब का सीख लिया था।

मेरी हर कोशिश, हर दुआ,

बस एकतरफ़ा सफर बनकर रह गई।

और फिर एक दिन…

सच ने चुपचाप दस्तक दी—

कि मैं तुमसे उतना ज़्यादा प्यार कर बैठी थी,

जितना तुम्हारे दिल में कभी था ही नहीं।

तो अगर मैं कभी तुम्हारे लिए कुछ थी…

तो शायद एक दिन,

जब ये शोर थम जाएगा,

तुम्हें मेरी वही खामोशी याद आएगी—

जो तुम्हारे जाने के बाद भी

तुम्हारा नाम पुकारती रही… ❤️

— अनकहे जज़्बात

मर्म (Moral):

जो रिश्ता सिर्फ एक तरफ़ से निभाया जाए, वो मोहब्बत नहीं, खुद से बेवफाई बन जाता है।

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