
अपनी कलम से,
खोया जो झील सी आँखों में,
कह सके क्या मजाल है.....
गर हौंसला बुलंद हो अपना, फ़िर जीत भी होना निश्चय है,
माना दीपक आंधी में जला,यूँ बुझ जाए क्या मजाल है!
है सीना पहाड़ों का चीर,पानी जो लाया हूँ नदी बनाकर,
ऐसे पानी को आँख दिखाए, सागर की क्या मजाल है!
एक एक जुगनू को साथ लेकर,है रौशनी लाई मैंने यहां,
उस रौशनी को चांद आँख दिखाए, ऐसी क्या मजाल है!
हर तरफ है घोर निराशा, न कोई है आस उसे जीने की,
अपनापन का दिया एहसास, अब रूठे क्या मजाल है!
सागर से कोई गहरा नहीं जग में,वो कहता रहा सबसे,
खोया जो झील सी आँखों में, कह सके क्या मजाल है!
बहुत देखी ऐसी दुनियाँ, कहता था वो सबसे हर दिन,
आज आईने से हुआ सामना, अब कहे क्या मजाल है!
अब कहे क्या मजाल है.......
अब कहे क्या मजाल है.......
🖋️ डॉ.सूर्य प्रताप राव रेपल्ली 🙏
मौलिक व स्वरचित @ सर्वाधिकार सुरक्षित
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