
"कब कहाँ मैं कुछ करती हूँ"
सुबह उठते ही चूल्हा चौंका,
नाश्ता सबके लिए बनाती हूँ,
कर फिर तैयार बच्चों को,
टिफ़िन इनके हाथ थमाती हूँ,
भूल कैसे सकती हूँ मां जी की दवाई,
ऐनक छड़ी बाबू जी को थमाती हूँ,
पोंछ पसीना माथे से थोड़ा आराम का सोचती हूँ,
फिर बाबूजी के लिए तैयार चाय बिन चीनी करती हूँ,
दोपहर हो चली है तैयार खाना फिर करना है,
यही सोचते सोचते एक नज़र घड़ी पर दौड़ाती हूँ,
आ ही गई होगी बस स्कूल से बच्चों की,
हो धूप चाहें बारिश लेने उनको घर से निकलती हूँ,
शाम हो गई है अब पड़ोस से कोई खास हैं आये,
आव भगत बस थोड़ी उनकी करती हूँ,
महमान वो गए ही थे घर लो ये भी आ गए,
बदलते ही कपड़े इनके चाय पानी ले आती हूँ,
अब रात में क्या बनाना है उधेड़ बुन इसी में हूँ,
है कमर में दर्द मां जी के थोड़ा बाम लगाती हूँ,
रात हो चली है बस समेट सब लेती हूँ,
सुबह फिर उठना जल्दी ख्याल इसी में सो जाती हूँ!
#अमनअजनबी