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मेरे समय तुम साथ चलना

रात के 10 बजने वाले हैँ. कुछ लिखने का मन किया बड़े दिनों बाद. आज ही दो दिन की छुट्टी के बाद वापस कौडीराम आयी हूँ. अब ज्यादातर रोडवेज बस से आती जाती हूँ. पैसा और समय दोनों की बचत. हाँलाकि अपनी गाड़ी हैँ, पर ड्राइविंग स्किल थोड़ी अच्छी नहीं हैँ तो वो कम प्रयोग मे आ पाती है. इंतजार है की नन्हू नंदू रुब्बो आएंगी खजाकिस्तान से गर्मी की छुट्टियों मे तब कहीं घूमने का प्लान करेंगे.

कौडीराम मे रहते और नौकरी करते लगभग साढ़े चार साल होने जा रहें हैँ. अच्छी जगह है. मन लग गया है. काम मे व्यस्त रहने से मन लगा रहता है. पर घर तो घर होता है. साप्ताहिक अवकाश या कोई सरकारी छुट्टी होते ही दिन काटना मुश्किल हो जाता है. तुरंत शाम की बस से या कभी कभी अपनी स्कूटी से भी मऊ पापा के पास निकल लेती हूँ. जाते समय पापा के पास जाने की वैसी ही खुशी होती है जैसे एक छोटा बच्चा बहुत देर बाद अपनी माँ को देख कर सीने से चिपक जाता है. शनिवार का दिन बड़ी मुश्किल से गुजरता है. उस दिन कार्यालय का काम जल्दी निपटाकार, पापा के पसंद के कुछ फल वगैरह खरीदते हुए मऊ की बस लें लेती हूँ.

आज के डिजिटल युग मे नौकरी करना आसान नहीं रह गया है. हमेशा स्वयं को अपडेट रखना पड़ता है. फिर भी मेरा मानना है की मेहनत करने वालो को कहीं भी दिक्कत नहीं होती. यहाँ मेरा किराये का सुन्दर सा छोटा पर सुसज्जित घर है, जहाँ मैं ऑफिस से या कार्यक्षेत्र से आने के बाद दुनिया के भीड़ भाड़ से दूर कुछ पल खुद के साथ जीती हूँ, बातें करती हूँ. अपनी मनपसंद चाय अदरक इलायची वाली बना कर टेलीवीजन पर एक अच्छी फ़िल्म देखती हूँ. रात का भोजन बनाने की इच्छा तो नहीं होती पर जीने के लिए टेलीविज़न से ज्यादा भोजन जरुरी होता है, ये सोच कर कुछ बना लेती हूँ.

आज जब नौकरी के दौरान कुछ परेशान होती हूँ तब याद आता है, पापा हम चार भाई बहनो को साथ लेकर अपने जीवन के पैतीस साल से ज्यादा घर से दूर रहकर नौकरी करते हुए कैसे संभाला होगा. मैं तो फिर भी अपने लोगों के बीच मे रह कर नौकरी कर रही हूँ.

कई लोग कहते है की महिलाओ के लिए कृषि विभाग की नौकरी ठीक नहीं है, इससे अच्छा सरकारी शिक्षक की नौकरी है. मैं भी शिक्षक का बहुत सम्मान करती हूँ और अपने सभी गुरुओं को प्रणाम करती हूँ जिन्होंने इस योग्य बनाया. पर यहाँ मै कहना चाहूंगी की मुझे अपनी नौकरी और कृषि विभाग पर गर्व है. इसने मुझे किसानो और गांव से जुड़ने, खेत खलिहान घूमने, कृषि की नयी तकनिकी को समझने का अवसर दिया.

मेरे घर से कुछ दूर हर गुरुवार को पाण्डेपार की बाजार लगती है जहाँ ताजी सब्जियाँ और फल मिलते हैं. मैं अक्सर यही से खरीदारी करती हूँ.

कुल मिलाकर कहना चाहूंगी की जीवन जीना एक कला है. अकेला इंसान इतना मजबूत हो सकता है, ये यहीं आकर मैंने जाना. मैं स्वयं मै परिपूर्ण हूँ, खुश हूँ, आनंद मै हूँ. अपनों से दूर रहकर भी उनके दिलों मै हूँ.

पदमा राय

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