
चोर, मवाली, गुंडे यारो, चला रहे हैं देश, बदल-बदल कर भेष
कभी दाढ़ी कटवाते हैं, कभी बढ़ा लेते हैं केश
कभी धर्म पे दंगे करवाते हैं, कभी धर्म के उनके लगती ठेस
चोर, मवाली, गुंडे यारो, चला रहे हैं देश, बदल-बदल कर भेष।।
कभी चंदा चोरी करते हैं, कभी धंधा चोरी करते हैं
कभी डराते हैं लोगों को, कभी लोगों से ही डरते हैं
कभी कसमें खाते संविधान की, कभी उसी को दलते हैं
कभी लोकतंत्र के दुहाई देते, कभी तानाशाह बन चलते हैं ।।
चोर, मवाली, गुंडे यारो, चला रहे हैं देश, बदल-बदल कर भेष
स्वयं को सेवक कहते हैं पर फ़ैलाते हैं द्वेष
स्वयं को साधु कहते हैं, पर लडवा दिए अख़लाख और सुरेश
चोर, मवाली, गुंडे यारो, चला रहे हैं देश, बदल-बदल कर भेष ।।
बदल बदल कर भेष घूमते, जल, जंगल, जायदाद लूटते
प्रश्न पूछ ले जो कोई इन से, उन पर चल जाते हैं केस
जनता भी अब जानवर हो गई, वोट के भी तय कर दिए हैं रेट
चोर, मवाली, गुंडे यारो, चला रहे हैं देश, बदल-बदल कर भेष।।
© सुशील कुमार पटियाल