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मेरा पहला प्यार

।✍️ मेरा पहला प्यार। कवि: विजय शर्मा एरी1बचपन की गलियों में जब वो मुस्कुराई,

दिल की धड़कनें जैसे गीत बन आई।

नीली वर्दी में मासूम सा चेहरा,

यादों में बस गया पहला सवेरा।2किताबों के पन्नों पर उसकी परछाई,

हर अक्षर में उसकी छवि समाई।

दोस्ती की डोर धीरे-धीरे बंधी,

मन की गहराई में चाहत गढ़ी।3अनकहे शब्दों का मौन संवाद,

नज़रें मिलते ही होता इज़हार।

दिल की धड़कनें कहतीं हर बार,

यही है मेरा पहला प्यार।4विदाई की शाम में साहस जुटाया,

दिल की गहराई से सच बतलाया।

उसकी आँखों में नमी और हँसी,

पल में बदल गई ज़िंदगी की दिशा।5जुदाई का मौसम आया अचानक,

दूरी ने दिल को कर दिया व्याकुल।

पत्रों में लिखे गए भाव अनगिनत,

प्यार रहा अडिग, समय रहा असमर्थ।6कॉलेज की राहों में भी वो याद रही,

हर कविता में उसकी परछाई रही।

तालियों की गूँज में भी दिल कहता,

संध्या ही मेरी प्रेरणा रहता।7साहित्यिक मंच पर जब वो मिली,

सालों की दूरी पल में सिमटी।

आँखों की चमक वही पुरानी,

दिल ने कहा — यही है कहानी।8उसने हाथ थामा और कहा,

“पहला प्यार कभी नहीं मिटता।”

दिल ने महसूस किया उस क्षण,

प्यार अमर है, यही जीवन।9जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ,

सपनों का संसार साकार हुआ।

कविताओं में उसकी छवि बस गई,

प्यार की धुन हर गीत में गूँज गई।10आज भी जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,

पहला प्यार ही सबसे सच्चा लगता है।

वो एहसास जो कभी पुराना नहीं होता,

दिल की धड़कन में हमेशा रहता है।🌹

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