
पेड़ मौन में गाते हैं,
पक्षी उड़ते हैं अपना मूल्य जानने को।
प्रकृति की हर वस्तु एक सुर में रची-बसी है,
पर अफ़सोस!
मानव जीवन कितना दुखमय है।
कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं,
धूल — और केवल धूल ही अंत है!
हम खो जाते हैं व्यर्थ के कामों में,
कुछ भी पाने के लिए नहीं।
किस बात का गर्व?
केवल धूल!
सब चले गए अपनी कब्रों में,
कुछ भी पीछे न छोड़ सके।
कोई उनके लिए नहीं गाता,
समय ने मिटा दी
उनकी सारी महिमा।
पेड़ अब भी मौन में गाते हैं !
रुखसार अहमद फारुकी