
पुरखो से विरासत में मिली हो
जिन्हें गेहूं चावल बेचने की दुकान
वे परिश्रम से कमाए
स्वाभिमान का महत्व कैसे जान पाएंगे......
जो खाते हो दूसरों के मुंह से
छीन कर के निवाला
वे पसीने से कमाई नून रोटी
का महत्व कैसे जान पाएंगे....
ईमान बेच कर खड़े कर लिए हो
जिन्होंने अपने महल
वे मजदूरी करके रहने वाले
किराए के मकान का महत्व कैसे जान पाएंगे......
छल करके मुस्कुराना
जिनकी आदतों में हो गया सुमार हो
वे निश्चल के आंखों से बहे
आंसुओं का महत्व कैसे जान पाएंगे......
काव्य सृजन
✍️ नीतेश कुमार ( स्वलिखित कविता बड़ी विरासत)
It's authentic poetry written by neetesh kumar
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