रे मुनि! व्यर्थ न सिंह जगाओ, इस शांत सभा में आकर,
मत खेलो काल की ज्वाला से, अपनी ही देह जलाकर।
हमने तो बचपन की क्रीड़ा में, अनगिनत धनुष तोड़े हैं,
तब तो आपने क्रोध के अश्व, न एक बार भी छोड़े हैं।
यह जीर्ण पुरातन काष्ठ खंड, क्या शिव का गौरव भारी है?
रघुवर के कोमल कर छूते ही, हुई विदा की तैयारी है।
जिस पर तुम ममता दिखलाते, वह तिनके सा ढह जाएगा,
सूर्यवंश के तेज के आगे, अंधकार क्या टिक पाएगा?
मत दिखाओ यह तीखा फरसा, हम न कुम्हड़बत्तिया के फूल,
तर्जनी देख जो मुरझा जाएं, वह क्षत्रिय नहीं, मुनि! तेरी भूल।
यह भुजा काल का ग्रास बने, सहस्त्रबाहु को धूल चटाती है,
जब चढ़ती है भृकुटी रण में, तो धरती भी थर्राती है।
विप्र जानकर शीश झुकाया, यह रघुकुल की मर्यादा है,
पर रण में मौन खड़े रहना, वीरों के साथ अन्याय ज्यादा है।
देव, दनुज, या काल खड़ा हो, हम न किसी से डरते हैं,
क्षत्रिय हैं हम! मृत्यु का स्वागत, हँसकर आलिंगन करते हैं।
उठाओ शस्त्र या वाणी रोकें, अपना प्रताप अब दिखलाएँ,
हम मुस्कुराकर खड़े ढाल बन, आप अपनी शक्ति आज़माएँ।