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आख़िर युद्ध क्यों?

युद्ध करे न भला किसी का, देख उठा इतिहास

ज़्यादा पाने की चाह में हुआ मानवता का ह्रास

कहीं क्रोधित है मनुज क्योंकि चूल्हा नहीं जला है

वहीं दूजे कोने में कोई अपना दफन हुआ है

देखो मुट्ठीभर लोगों ने दुनिया का किया विनाश

इतना रक्त बह चुका है पर बुझी न इनकी प्यास

क्या तबाही के खातिर पृथ्वी का अस्तित्व था आया

सभ्यता का पाठ पढ़कर भी मनुष्य ने व्यक्तित्व ना पाया

इससे तो कहीं अच्छा था जंगल में इसका प्रवास

अपने मन की कालिमा से मिटा दिया जग का उजास

'वसुधैव कुटुंबकम्’ धारणा क्या रह गई मात्र एक उक्ति

लोभ, स्वार्थ, मद, द्वेष से कब पा सकेंगे मुक्ति

क्या इतना ही मुश्किल है करना शांति का एक प्रयास

युद्ध करे न भला किसी का कहता आया इतिहास

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