
समय के साथ कितना कुछ परिवर्तित हो जाता है, हम कल्पना भी नहीं कर सकते। एक समय था कि लगता था सब कुछ हासिल कर सकते हैं। जोश का स्तर इतना ऊँचा था कि यूपीएससी जैसी परीक्षा भी मुश्किल नहीं लगती थी। भीतर इतनी ऊर्जा थी कि कुछ भी असंभव नहीं लगता था। हर समय एक उमंग, कुछ कर गुजरने का जज़्बा उफान पर रहता था।
अब वही समय है कि आसान से काम भी पहाड़ तोड़ने जैसे लगते हैं। नीरसता ऐसी है कि घर-परिवार से भी उकताहट सी लगती है। भीतर ऐसी शून्यता है कि प्रेम, स्नेह भी उसको भर नहीं पाते। अब तो थकान तन से उतरकर मन पर बैठ गई है, जो संसार की हर वस्तु से आकर्षण छीन ले गई है।
अब निर्णय करना मुश्किल है कि समय इतना बदला है या मेरे अंतर्मन का संसार बदल गया है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वयं को जानने की यात्रा में इस भौतिक जगत की सच्चाई ने मेरी आँखों से सारे भ्रम खत्म कर दिए हों। शायद यही वजह है कि मुझे आकर्षण के पीछे के भयानक सत्य दिखने लगे हैं। स्वाद के अंदर छिपे बीमारी के लक्षण डराने लगे हैं और प्रशंसा के शब्दों में स्वार्थ की झलक साफ दिखने लगी है, या फिर प्रशंसा के मोह से परे जाकर संतुष्टि का आनंद चख लिया है।
लेकिन इन सत्यों को जान लेने के बाद यह संसार मेरे लिए अब उतना सुंदर नहीं रहा, जितना कभी नज़र आता था। विडंबना यह है कि अब यहाँ दिल कैसे लगे? इसके कोलाहल से जी घबराता है; बाहर जितना शोर बढ़ता है, अंदर का सन्नाटा उतना गहरा होता जाता है, और चकाचौंध से आँखें धुंधलाने लगती हैं। अब तो शांत वातावरण में मौन का संगीत सुनने की आशा शेष रह गई है।
ग़ालिब के शब्दों में—
“रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो"
@अर्शिया अंजुम