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कविता – "स्त्री"

प्रिय स्त्री,

तन, मन और जीवन

सब समर्पित हों,

तभी तुम्हारा अस्तित्व है।

अपने सपनों को

किसी कोने में सजा कर रख दो,

और इस भ्रम से बहल जाओ

“इतनी आज़ादी तो है!”

तभी तुम्हारा व्यक्तित्व है।

सेवा करते-करते

बीमारियों से खोखला हो जाए शरीर,

किंतु चेहरे पर

संतुष्टि का मुखौटा सजा रहे

तब तुम महान हो।

वरना

स्त्री कहलाने की पात्र नहीं,

क्योंकि तुम

आदर्श के खाँचे में ढल नहीं सकती।

तो कोई और ग्रह खोज लो,

अब इस पृथ्वी पर

तुम्हारा सम्मान है,

तुम्हारा अहसास नहीं।

🪶*अर्शिया अंजुम*

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