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कुछ यादें…

कुछ यादें… वादों की तरह होती हैं,

जो वक्त के साथ फीकी नहीं पड़तीं—

बस दिल की तहों में और गहरी उतर जाती हैं…

वादे सच में नहीं मरते,

मर जाता है तो बस उन्हें निभाने का इरादा…

और जब इरादा बदल जाए,

तो इंसान भी बदल सा लगता है।

पति-पत्नी का रिश्ता भी अजीब होता है—

सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं,

बल्कि हर हाल में साथ निभाने का वादा होता है…

पर अगर दिल ही बदल जाए,

तो वही रिश्ता एक सवाल बन जाता है।

कभी सोचा है—

क्या रिश्ते वादों से चलते हैं,

या वादे ही रिश्तों को ज़िंदा रखते हैं…?

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