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दसवां तहखाना

सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था। कविता भजन गा रही थी। रात को सुनीता ने लिखा आज सोने की बारिश हो। और रात को सोने की बारिश हुई। उसने लिखा बारिश बंद हो और गरीबों में बंट जाए। और बंट गई। सुनीता समझ गई कि सोच समझ कर लिखना होगा। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 13 - दसवां तहखाना सुनीता सीढ़ी से नीचे उतरी। सीढ़ी लंबी थी। नीचे अंधेरा था। नीचे ठंडी हवा आ रही थी। रानी ऊपर से बोली माँ मत जाओ। पर सुनीता को जाना था। वह पुजारिन थी। नीचे एक बड़ा दरवाजा था। दरवाजे पर लिखा था दसवां तहखाना। यह इम्तिहान का तहखाना है। जो भी अंदर जाएगा उसे तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला लालच का दूसरा डर का तीसरा प्यार का। सुनीता ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी थी। बीच में सिंहासन था। सिंहासन पर एक औरत बैठी थी। औरत ने सोने की साड़ी पहनी थी। उसने मुकुट पहना था। वह बोली मैं रानी लक्ष्मी हूँ। मैंने तीन सौ साल पहले यह कोठी बनवाई थी। सुनीता ने प्रणाम किया। रानी बोली तुम्हें तीन इम्तिहान देने होंगे। पहला इम्तिहान लालच का। सामने सोने का पहाड़ बन गया। हीरे मोती नोट सब था। रानी बोली यह सब तुम्हारा है। ले जाओ और अमीर बन जाओ। सुनीता ने सोचा। वह गरीब थी। पर उसने बच्चियों को देखा। मंदिर को देखा। बोली मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे बच्चियां चाहिए। सोना गायब हो गया। पहला इम्तिहान पास। दूसरा इम्तिहान डर का। सामने सौ भूत आए। वे बोले हम मार देंगे। सुनीता डर गई। पर उसने ओम नमः शिवाय बोला। भूत गायब हो गए। दूसरा इम्तिहान पास। तीसरा इम्तिहान प्यार का। सामने दस बच्चियां आईं। रानी बोली एक को चुनो। एक बचेगी नौ मरेंगी। सुनीता रोने लगी। बोली मैं एक को नहीं चुनूंगी। दसों मेरी बेटियां हैं। साथ जीएंगी साथ मरेंगी। रानी हंसने लगी। वह गायत्री देवी बन गई। बोली तुम सच्ची पुजारिन हो। तुमने तीनों इम्तिहान पास कर लिए। अब दसवां तहखाना बंद हो जाएगा। तुम्हें वरदान मिलता है। तुम जो लिखोगी सच होगा। सुनीता ऊपर आई। आंगन बंद हो गया। मंदिर में आरती हो रही थी। मोहन झाड़ू लगा रहा था।

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