
"तुम्हारी हंसी"श्रृंगार रस कविता
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हंसने पर तुम्हारे मुख पर मुस्कान दौड़ जाती है,
पीले गुलाब में सर्द लहर सी नजर आती है।
चेहरे पर लाती हो एक असीम सा प्यार,
दिल धड़कन को बढ़ा जाती है "तुम्हारी हंसी"
चलती हो जब थिरक कर तुम, तो धड़कन ठहर जाती है,
मेरे ख्यालों के मन मंदिर में तुम्हारी तस्वीर नजर आती है।
क्या हो तुम यह में नहीं जानता,
मेरे दिल के प्यार को जगा जाती है तुम्हारी हंसी।
गालों के कपोल को देखकर लाल गुलाब भी शर्मा जाए,
होठों की गुलाबी पंखुड़ी, देखे तो पवन भी थम जाए।
तुम्हारी सरसराहट से हिल जाते हैं मेरे दिल के तार,
सुलगते अरमानों को बढ़ा जाती है तुम्हारी हंसी।
यौवन तुम्हारा ऐसा है जैसे दो कपोत उड़ रहे हो,
पकड़ना चाहूं मैं उन्हें तो जैसे वो डर रहे हो ।
चलने पर तुम्हारी थिरकन से कट जाते हैं दिल के तार,
जोड़ पाऊं उससे पहले जुबा को खामोश देती है "तुम्हारी हंसी"।
पवन कश्यप पत्रकार बीकानेर।
इस कविता की रचना १९८४ में की थी। जब मैं कक्षा 10 में पढ़ता था।