रिश्तों की कीमत और एक शब्द ‘तलाक’”
आजकल “तलाक” कहना कितना आसान हो गया है…
जैसे एक शब्द नहीं, बस एक औपचारिकता हो गई हो।
मंदिर में जब फेरे लिए थे,
ईश्वर को साक्षी मानकर वचन दिए थे,
वो सात कदम सिर्फ कदम नहीं थे,
दो रूहों का एक सफ़र तय हुआ था…
पर आज वही रिश्ता,
एक कागज़ के टुकड़े पर खत्म कर दिया जाता है,
जैसे कहानी नहीं,
बस कोई अधूरी फाइल बंद कर दी हो…
एक तरफ कोई रिश्ता बचाने में लगा है,
हर टूटते धागे को जोड़ने की कोशिश में,
और दूसरी तरफ कोई,
उसी धागे को बेरहमी से तोड़ने में…
बीच में खड़ा वो मासूम बच्चा,
जिसे ना रिश्तों की समझ है,
ना हालात की सज़ा का कारण…
बस सोचता है—
“मैं किसका हूँ…?
माँ का या पिता का…?”
घर जो कभी हँसी से गूंजता था,
आज खामोशी का बोझ उठाए बैठा है,
दीवारें भी पूछती हैं—
“क्या यही था वादा साथ निभाने का…?”
तलाक गलत नहीं, अगर ज़ुल्म से छुटकारा हो,
पर हर छोटी बात पर हार मान लेना भी सही नहीं…
क्योंकि रिश्ता सिर्फ प्यार से नहीं,
सब्र, समझ और कोशिश से चलता है…
कहानी खत्म करना आसान है,
पर एक परिवार बचाना…
वो हिम्मत हर किसी में नहीं होती… 💔
— Dr. Surak Selvi Chinnappan ✍️
👉Moral (सीख):
रिश्ते निभाने के लिए सिर्फ प्यार नहीं,
बल्कि धैर्य, समझ और आपसी सम्मान ज़रूरी होता है।
अगर रिश्ता ज़ुल्म बन जाए तो उससे निकलना साहस है,
पर अगर ego और गलतफहमियों में टूटे—
तो वो हार है, जिसे थोड़ी कोशिश से जीता जा सकता था।
क्योंकि सबसे बड़ा सच यही है—
तलाक दो लोगों का नहीं,
एक पूरे परिवार का दर्द बन जाता है।