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आख़िरी मोड़ से पहले

आख़िरी मोड़ से पहले

जाने से पहले…

बस इतना बता दो—

क्या कभी मेरा एहसास तुम तक पहुँचा था?

क्या उस मोहब्बत का कोई कतरा

तुम्हारे दिल में ठहरा था,

जिसे मैंने सिर्फ तुम्हारे नाम किया था?

मैंने तो चुपचाप सब कुछ तुम्हें दे दिया—

अपना वक़्त, अपनी फिक्र,

और ये बेपरवाह धड़कता दिल।

दर्द ने जब-जब मुझे घेरा,

मैं फिर भी ठहरी रही…

तुम्हारी खामोशी को भी समझती रही,

हर मोड़ पर तुम्हें ही चुनती रही—

यहाँ तक कि जब तुमने मुझे

सिर्फ एक “विकल्प” समझकर छोड़ दिया।

तुम शायद कभी देख ही न पाए—

कि तुम्हें अपनी दुनिया में बनाए रखने की जद्दोजहद में,

मैं खुद से कितना दूर होती चली गई…

अपनी ही पहचान से अनजान होती चली गई।

मगर अब…

इस आख़िरी मोड़ से पहले,

मैं बस इतना चाहती हूँ कि तुम याद रखो—

किसी ने तुम्हें इतनी शिद्दत से चाहा था,

कि वो खुद से मोहब्बत करना भूल गया।

और एक दिन…

जब मेरी कमी तुम्हें

मेरी मौजूदगी से ज़्यादा भारी लगेगी,

जब हर खामोशी तुम्हें मेरा नाम सुनाएगी—

शायद तब…

तुम मुझे समझ पाओगे।

मर्म (Moral):

जो खुद को खोकर किसी को चाहता है, वो अंत में सिर्फ दर्द पाता है—इसलिए मोहब्बत में खुद को खोना नहीं, खुद को संभालना सीखो।

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