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अगर हम फिर कभी मिले…

अगर हम फिर कभी मिले…

शायद किसी दिन,

ज़िंदगी के किसी अनजाने मोड़ पर,

हम आमने-सामने खड़े होंगे—

तुम… और मैं।

शायद तुम्हारी ज़िंदगी आगे बढ़ चुकी होगी,

किसी अपने के साथ, किसी अपनेपन में…

तुम्हारे लिए वो बस एक और दिन होगा,

मगर मेरे लिए—

जैसे एक पूरी उम्र ठहर गई हो उसी पल में।

वो मुलाक़ात भी अजीब होगी—

न कोई सवाल, न कोई शिकायत,

बस नज़रों में ठहरी हुई कुछ अधूरी बातें…

क्या तुम मुझे पहचान पाओगे?

या यूँ ही गुज़र जाओगे मेरे पास से,

जैसे मैं कभी था ही नहीं…

जैसे “हम” सिर्फ एक ख्वाब थे,

जो सुबह होते ही बिखर गए।

तुम शायद मुड़कर नहीं देखोगे…

मगर मैं ठहर जाऊँगा उसी पल में,

तुम्हारी उस हल्की सी खुशबू को महसूस करते हुए—

जो कभी मुझे “घर” जैसी लगती थी।

घबराना मत…

मैं पहचान लूंगा तुम्हें—

क्योंकि कुछ यादें धुंधली नहीं होतीं,

वो बस दिल के किसी कोने में

खामोश रहना सीख लेती हैं।

शायद वक़्त मेरी नज़रों को कमज़ोर कर दे,

शायद चेहरे धुंधले पड़ जाएँ…

मगर तुम्हें मैं फिर भी वैसे ही देखूँगा,

जैसे पहली बार देखा था—

बिलकुल साफ, बिलकुल अपना।

और तब…

मैं कुछ नहीं कहूँगा,

बस दिल ही दिल में एक सवाल उठेगा—

अगर हम फिर कभी मिले…

तो क्या इस बार,

तुम ठहर पाओगे? ❤️

मर्म (Moral):

कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते, फिर भी वो ज़िंदगी भर अधूरे रहकर ही सबसे ज़्यादा पूरे लगते हैं—इसलिए जो साथ है, उसे खोने से पहले समझ लेना ज़रूरी है।

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