
धीरे-धीरे मैंने अपना तरीका बदला। मैंने बोलने से ज़्यादा सुनना शुरू किया। जब आप सामने वाले को पूरा ध्यान देकर सुनते हो ना, तो उसे सच में लगता है कि उसकी बात की कद्र हो रही है। और यहीं से चीज़ें बदलनी शुरू होती हैं। वो इंसान खुद ही आपके लिए खुलने लगता है, और फिर आपकी बात भी आसानी से समझने लगता है।
पहले मैं अक्सर लोगों की गलतियाँ सीधे बता देता था, सोचता था इससे चीज़ें जल्दी ठीक होंगी। लेकिन उससे उल्टा असर होता था—लोग रक्षात्मक हो जाते थे, दूरी बना लेते थे। फिर मैंने सीखा कि अगर वही बात थोड़ी नरमी और समझदारी से कही जाए, तो सामने वाला खुद उसे स्वीकार कर लेता है।
एक और चीज़ जो मैंने महसूस की—अगर आप किसी को बदलना चाहते हो, तो उसे ऐसा महसूस मत कराओ कि आप उस पर कुछ थोप रहे हो। बल्कि उसे ऐसा लगना चाहिए कि ये उसका खुद का विचार है। जब इंसान को लगता है कि फैसला उसका अपना है, तो वो बिना किसी दबाव के उस दिशा में आगे बढ़ता है।
आज मैं यही मानता हूँ कि असली प्रभाव वही होता है, जहाँ आप किसी के अहंकार को चोट पहुँचाए बिना अपनी बात मनवा सको। ताकत इस बात में नहीं है कि आप किसी पर हावी हो जाओ, बल्कि इस बात में है कि आप लोगों को अपने साथ लेकर चलो।