
कल्पना करो मैं वहीं खड़ा हूँ, जहाँ हवा में खामोशी घुली,
पेड़ों की शाखों पर यादों की, हल्की-हल्की रोशनी तली।
धूप भी जैसे ठहर गई हो, पत्तों पर अपनी चाल लिए,
और मैं खड़ा हूँ उस मोड़ पे, दिल में सौ सवाल लिए।
कल्पना करो मैं वहीं खड़ा हूँ, जहाँ रास्ते मुड़कर मिलते हैं,
कदमों की धड़कन कहती है—कुछ सपने भी सिलते हैं।
आसमान मेरे सिरहाने जैसे कहानी रोज़ सुनाता,
बादल अपने गीत पुराने, चुपके-चुपके याद दिलाता।
कल्पना करो मैं वहीं खड़ा हूँ, हवा मेरे कंधे सहलाती,
मुझसे कहती—“थोड़ा ठहर जा, हर सोच को उड़ान दे जाती।”
दूर किसी पगडंडी पर, उम्मीद की धीमी आहट है,
लगता है कल ही आएगा, पर दिल कहे—“आज ही राहत है।”
कल्पना करो मैं वहीं खड़ा हूँ, जहाँ नज़रें खुलकर बोलतीं,
नदियाँ अपनी धुन में बहतीं, लहरें सीने से टकरातीं।
उस पल मैं दुनिया के शोर से एक कदम आगे बढ़ जाता,
सपनों की उस मुस्कान को अपने दिल से जोड़ आता।