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वक्त के साए से जब भी निकलना चाहा ,

वक्त के साए से जब भी निकलना चाहा ,

उठना चाहा ,

जिंदगी की दौड़ में ,

बढ़ना चाहा ।

कि मेहनत मसक्कर,

खुद को बदलना चाहा ,

कहानी को अपनी,

खुद ही लिखना चाहा ।

खुद का कागज ,

खुद की कलम ,

खुद की स्याही,

मलाल न कुछ भी रखना चाहा ।

पर हार गई मैं ,

कुछ अपनो से,

पेपर भी नीलम हो गए ,

किस्मत पर फिर रोना चाहा ।

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