
जब तक रामप्रसाद जी का शरीर साथ दे रहा था, सब कुछ ठीक था। लेकिन 80 साल की उम्र में अब उनसे अकेले रहा नहीं जाता था। न वे खुद खाना बना पाते थे और न ही अकेले घर की देखभाल कर सकते थे। एक दिन उन्होंने अपने पाँचों बेटों को बुलाया और बड़े भावुक होकर कहा, "बेटा, अब मेरी उम्र हो गई है। मैं अकेले घर पर नहीं रह पा रहा हूँ। तुम पाँचों अपनी बीवी-बच्चों के साथ बाहर शहर में रहते हो। क्या तुम मुझे भी अपने साथ ले चलोगे? मैं किसी भी एक के पास रह लूँगा।"
लेकिन अफसोस, उन पाँचों बेटों ने एक सुर में मना कर दिया। किसी ने कहा कि उसका घर छोटा है, किसी ने बहाना बनाया कि उसकी पत्नी को परेशानी होगी, तो किसी ने व्यस्तता का हवाला दिया। पाँचों बेटे अपने पिता को उनके हाल पर छोड़कर अपनी चकाचौंध भरी जिंदगी में वापस लौट गए।
रामप्रसाद जी का दिल टूट गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस संपत्ति को उन्होंने अपने बेटों के लिए जोड़कर रखा था, उसका अब कोई मोल नहीं है, क्योंकि उनके बेटों के पास उनके लिए दिल में कोई जगह नहीं थी।
उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। रामप्रसाद जी ने अपनी पूरी 5 करोड़ की जायदाद, घर और जमीन बेच दी। उन्होंने उस पूरी रकम को गाँव के एक भव्य मंदिर के नाम दान कर दिया। उन्होंने उस मंदिर के ट्रस्ट से बस इतनी शर्त रखी कि वे अपने जीवन के अंतिम दिन उसी मंदिर परिसर में गुजारेंगे और भगवान की सेवा करेंगे।
जब बेटों को इस बात का पता चला कि उनके पिता ने 5 करोड़ की पूरी जायदाद मंदिर को दान कर दी है, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वे सभी भागे-भागे आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रामप्रसाद जी अब एक साधारण सेवक के रूप में मंदिर में लीन थे। उन्होंने अपने बेटों से बस इतना कहा, "जिस धन ने तुम्हें इतना अंधा कर दिया था कि तुम्हें अपने बूढ़े पिता की लाचारी नहीं दिखी, उस धन से अब समाज का भला होगा और मेरा मन शांत रहेगा।"
आज रामप्रसाद जी मंदिर में सुकून से रहते हैं और उनके पाँचों बेटे अपनी लालच और गलती पर पछता रहे हैं।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि माता-पिता का स्थान भगवान से भी ऊपर होता है। जायदाद तो फिर भी कमाई जा सकती है, लेकिन माता-पिता का आशीर्वाद और उनका साथ एक बार खो जाए, तो फिर कभी वापस नहीं मिलता।
क्या आपको लगता है कि पिता ने सही फैसला लिया?