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“मैं और मेरे अधूरे सपने”

जब भी जीवन में झाँकती हूँ,

हर बार स्वयं को

बेबस और लाचार ही पाती हूँ।

लोगों ने कहा —

“गलती तुम्हारी ही होगी”,

और मैं हर बार

अपने ही अस्तित्व पर प्रश्न उठाती रही।


सपने तो बहुत बड़े देखे थे मैंने,

पर सही समय पर

समझाने वाला कोई नहीं मिला।

बस एक चाह थी —

कोई ऐसा मिले,

जो मुझे मेरे भीतर की शक्ति से परिचित कराए,

जिसकी बातें मैं जीवनभर याद रख सकूँ।


हर किसी ने मेरी सीमाएँ गिनाईं,

कहा —

“तुम तो बस कंपाउंडर बन जाओगी।”

पर मेरे भीतर कहीं

एक इंजीनियर साँस ले रहा था।

मैंने हमेशा स्वयं को

उसी रूप में देखा था।


एक दिन जब किसी ने पूछा —

“क्या बनना चाहती हो?”

तो मैंने गर्व से कहा —

“इंजीनियर।”

पर उत्तर में हँसी मिली,

जैसे मेरे सपनों का कोई मूल्य ही न हो।


सच तो यह था कि

मैंने केवल रटना सीखा था,

समझना नहीं।

किसी ने यह नहीं बताया

कि ज्ञान किताबों से नहीं,

समझ से जन्म लेता है।


जब स्वयं को समझने निकली,

तो हर कदम पर ठोकरें मिलीं।

कभी सहारे खोजे,

कभी भीड़ में अपने तलाशे,

पर अंत में

स्वयं को अकेला ही पाया।


घर और दुनिया दोनों ने

मुझे मेरी “औकात” बताई,

फिर भी मैंने हार मानना नहीं सीखा।

कलम को मजबूती से थामे,

हर रोज़ नोटिस बोर्ड पर लगे

GATE परीक्षा के विज्ञापन पढ़ती थी,

और चुपचाप सपने बुनती थी।


पर धीरे-धीरे

मैं लोगों के लिए

एक मज़ाक बन चुकी थी।

फिर भी ईमानदारी से मेहनत की,

हर जिम्मेदारी निभाई।


फिर एक मोड़ आया,

जब मेरी उम्र को

किताबों से बड़ा बना दिया गया।

कहा गया —

“अब किताबें तब काम आएँगी,

जब तुम अपना घर संभालोगी।”


पर न जाने क्यों,

मेरी जिद सिर्फ किताबों से थी।

मुझे मंगलसूत्र से पहले

अपना अस्तित्व चाहिए था।

साथ चाहिए था समाज के लिए,

पर पहचान स्वयं के लिए।


कई बार कोशिश हुई

कि मैं किताबें छोड़ दूँ,

तो मैंने घर संभाल लिया।

लेकिन कुछ दिनों बाद

घर की गलियाँ भी छोड़ दीं,

और निकल पड़ी

खुद की तलाश में।


वहीं कहीं

तकनीक से मेरा परिचय हुआ,

और लगा जैसे

मेरे सपनों ने फिर से साँस ली हो।


मैं हर बार कुछ कर गुजरने का जुनून रखती थी,

पर धीरे-धीरे

खुद से ही निराश होने लगी।

दूसरों को खुश करने की कोशिश में

स्वयं को खोने लगी।


सपनों को सच करना

मेरी जिद थी।

एक समय ऐसा भी आया

जब मैंने भरोसा करना सीखा,

पर उसी मोड़ ने

ऐसा तमाचा मारा

कि उत्तर और दक्षिण जैसा अंतर दिख गया।


जिसे अपना समझा,

उसी ने रास्ता बदल दिया।

और तब

मेरे भीतर की वह नन्ही, आज़ाद चिड़िया

धीरे-धीरे सिमट गई।


अब न जाने क्यों,

अपने सपनों को मरते देख

मैं भी भीतर से टूटने लगी हूँ।

लेकिन कहीं न कहीं

आज भी एक उम्मीद बाकी है —

कि शायद एक दिन

मैं खुद को फिर से पा लूँगी।

आरती कुमारी ✍️

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