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दीवानगी वाला प्यार

दीवानगी वाला प्यार

लेखक: विजय शर्मा ऐरी

बारिश की हल्की-हल्की बूंदें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। शाम का समय था और पार्क में बैठे लोग मौसम का आनंद ले रहे थे। उसी पार्क की एक बेंच पर बैठा था आरव, जिसकी नजरें बार-बार सामने वाले रास्ते पर टिक जाती थीं।

वह किसी का इंतजार कर रहा था।

अचानक सामने से एक लड़की आती दिखाई दी। लंबे काले बाल, मासूम चेहरा और आंखों में अजीब सी चमक।

"नेहा..." आरव के होंठों से धीरे से निकला।

नेहा मुस्कुराते हुए उसके पास आई।

"कब से इंतजार कर रहे हो?" उसने पूछा।

"पिछले तीन सालों से..." आरव ने मुस्कुराकर कहा।

दोनों हंस पड़े।

असल में आरव और नेहा कॉलेज के समय से एक-दूसरे को पसंद करते थे। लेकिन कभी अपने दिल की बात नहीं कह पाए थे। अब दोनों नौकरी करने लगे थे और अक्सर इसी पार्क में मिलते थे।

उस दिन बारिश और भी तेज हो गई।

नेहा ने कहा, "चलो कहीं छत के नीचे चलते हैं।"

आरव ने अपना जैकेट उतारकर उसके सिर पर रख दिया।

"तुम भीग जाओगे।"

"अगर तुम्हें बचाने के लिए भीगना पड़े तो मंजूर है।"

नेहा ने उसकी आंखों में देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि यह लड़का सचमुच उससे बहुत प्यार करता है।

कुछ दिनों बाद दोनों का प्यार और गहरा हो गया।

वे घंटों फोन पर बातें करते।

कभी-कभी रात के दो-दो बजे तक।

एक दिन नेहा ने पूछा, "अगर मैं तुम्हें छोड़कर चली गई तो?"

आरव तुरंत बोला, "तो मैं तुम्हें ढूंढ लूंगा।"

"अगर मैं किसी दूसरे शहर चली गई?"

"वहां आ जाऊंगा।"

"अगर मैं किसी और से शादी कर लूं?"

आरव कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला, "फिर शायद मैं जी तो लूंगा, लेकिन जिंदगी नहीं जी पाऊंगा।"

नेहा की आंखें नम हो गईं।

उसने पहली बार महसूस किया कि यह साधारण प्यार नहीं था।

यह दीवानगी वाला प्यार था।

समय बीतता गया।

एक दिन नेहा के घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी।

लड़का अमीर था, विदेश में नौकरी करता था।

जब नेहा ने यह बात आरव को बताई तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

"तुमने क्या कहा?"

"मैंने मना किया, लेकिन पापा नहीं मान रहे।"

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

"तो अब क्या होगा?"

नेहा भी रोने लगी।

"मुझे नहीं पता।"

उस रात दोनों सो नहीं सके।

अगले दिन आरव सीधे नेहा के घर पहुंच गया।

उसने पहली बार उसके पिता से मुलाकात की।

"अंकल, मैं नेहा से प्यार करता हूं।"

नेहा के पिता गुस्से से भर गए।

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की?"

"मैं सिर्फ नेहा का हाथ मांगने आया हूं।"

"तुम्हारे पास क्या है?"

"सच्चा प्यार।"

"सच्चे प्यार से घर नहीं चलता।"

आरव चुप हो गया।

उसके पास सचमुच ज्यादा पैसा नहीं था।

लेकिन उसके दिल में नेहा के लिए अथाह प्यार था।

उस दिन के बाद आरव ने खुद को काम में झोंक दिया।

दिन-रात मेहनत करने लगा।

ओवरटाइम करता।

नए प्रोजेक्ट लेता।

कभी-कभी तो केवल तीन-चार घंटे ही सोता।

उसका एक ही लक्ष्य था—

खुद को साबित करना।

एक साल बीत गया।

आरव की मेहनत रंग लाई।

उसे प्रमोशन मिला।

अच्छी सैलरी मिलने लगी।

उसने अपना छोटा सा घर भी खरीद लिया।

लेकिन इस पूरे साल उसने नेहा से कोई संपर्क नहीं किया।

उसे डर था कि कहीं वह कमजोर न पड़ जाए।

उधर नेहा भी आरव को भूल नहीं पाई।

हर दिन उसकी याद में रोती।

उसके फोन नंबर को बार-बार देखती।

लेकिन कॉल नहीं करती।

क्योंकि उसने आरव से वादा किया था कि वह उसके सपनों की राह में बाधा नहीं बनेगी।

एक दिन अचानक नेहा के घर घंटी बजी।

दरवाजा खुला।

सामने आरव खड़ा था।

सूट पहने हुए।

आत्मविश्वास से भरा हुआ।

उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता था।

"नमस्ते अंकल।"

नेहा के पिता उसे पहचान गए।

"तुम?"

"जी। मैं फिर से नेहा का हाथ मांगने आया हूं।"

"और इस बार तुम्हारे पास क्या है?"

आरव मुस्कुराया।

"घर है, नौकरी है, सम्मान है... लेकिन सबसे बड़ी बात, नेहा के लिए वही प्यार है जो पहले था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

तभी नेहा अंदर से बाहर आई।

उसे देखकर आरव की आंखें भर आईं।

एक साल बाद वह उसे देख रहा था।

नेहा भी खुद को रोक नहीं पाई।

उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

"तुम वापस आ गए..."

"मैंने कहा था ना, तुम्हें लेने जरूर आऊंगा।"

नेहा के पिता सब देख रहे थे।

उन्होंने पहली बार दोनों की आंखों में सच्चाई देखी।

उन्होंने धीरे से पूछा,

"अगर मैं मना कर दूं तो?"

आरव ने कहा,

"फिर भी मैं नेहा की खुशी की दुआ करता रहूंगा।"

"और अगर उसकी शादी किसी और से हो गई?"

"तो मैं उसकी खुशियों के लिए भगवान से प्रार्थना करूंगा।"

नेहा के पिता की आंखें नम हो गईं।

उन्हें समझ आ गया कि यह केवल आकर्षण नहीं है।

यह सच्चा प्रेम है।

कुछ देर बाद उन्होंने कहा,

"बेटा, मैंने जिंदगी में बहुत कुछ देखा है। पैसा, शोहरत, बड़ा घर... सब देखा है। लेकिन किसी को इस तरह प्यार करते पहली बार देखा है।"

नेहा और आरव की सांसें रुक गईं।

"अगर मेरी बेटी भी तुम्हें उतना ही चाहती है जितना तुम उसे चाहते हो, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।"

यह सुनते ही नेहा खुशी से रो पड़ी।

आरव की आंखों से भी आंसू बह निकले।

कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई।

शादी में पूरे शहर को बुलाया गया।

जब जयमाला हुई तो बैंड पर एक पुराना बॉलीवुड गीत बज रहा था—

"तेरे मेरे मिलन की ये रैना, नया कोई गुल खिलाएगी..."

नेहा मुस्कुरा रही थी।

आरव उसे लगातार देख रहा था।

नेहा ने धीरे से कहा,

"अब भी ऐसे ही देखते रहोगे?"

आरव हंस पड़ा।

"क्या करूं, मेरी दीवानगी कम ही नहीं होती।"

शादी के बाद भी उनका प्यार वैसा ही रहा।

आरव हर सुबह नेहा के लिए चाय बनाता।

नेहा उसके लिए लंच तैयार करती।

छोटी-छोटी बातों में दोनों खुशियां ढूंढ लेते।

एक दिन उनकी बेटी हुई।

जब आरव ने पहली बार अपनी बेटी को गोद में लिया तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

नेहा ने पूछा,

"क्यों रो रहे हो?"

आरव मुस्कुराया।

"क्योंकि भगवान ने हमारे प्यार की सबसे खूबसूरत निशानी हमें दे दी है।"

सालों बाद भी जब लोग दोनों को साथ देखते तो कहते,

"आज के जमाने में ऐसा प्यार कहां मिलता है?"

और नेहा हंसकर जवाब देती,

"जब प्यार में सच्चाई हो, विश्वास हो और थोड़ा सा पागलपन हो, तब दीवानगी वाला प्यार मिलता है।"

आरव तुरंत जोड़ देता,

"और जब दो लोग एक-दूसरे का साथ कभी न छोड़ें, तब वह प्यार जिंदगी भर चलता है।"

दोनों एक-दूसरे का हाथ थाम लेते।

सूरज धीरे-धीरे ढल रहा होता।

लेकिन उनके प्यार की रोशनी कभी कम नहीं होती।

क्योंकि वह केवल प्यार नहीं था...

वह दीवानगी वाला प्यार था, जो समय, दूरी और मुश्किलों से भी बड़ा था।

समाप्त

लेखक: विजय शर्मा ऐरी

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