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माता जो निकली कुमाता

बचपन से ही मैं त्रस्त हो गया,

जीवन मेरा कष्ट हो गया

सुख की दशा को भूला मैं

इसके झूले में कभी न झूला मैं

घूट अश्रु के पीता मैं

अत्याचारों से घिरकर जीता मैं

कभी कभी ममता के फूल खिले

फिर निर्ममता के मेघ घिरे

भूखे पढ़ने कभी मैं जाता

फिर दोपहर का भोजन भी न पाता

आता कभी जो घर पर तो

दरवाजों पर ताला बंद पाता

कैसे वो दिन भूल मैं पाऊ

अभी आगे और बतलाऊ

पता नहीं कहां वो खोई रहती

बच्चों का कहां ध्यान ही रखती

बंद कमरे में खुद को मैं पाता

भूख प्यास से व्याकुल हो जाता

मध्य रात्रि में कहा को जाऊं

फिर से रोते रोते सो जाऊं

पर उसको जरा दया भी न आए

की हम पर दया करुणा दिखलाए

सबके बीच में प्यार लुटाती

पर अकेले होने पर भूल वो जाती

अब तक पुत्र कुपुत्र सुना था

कहानी किस्से में भी पढ़ा था

पर मैं लिखता अविश्वसनीय वार्ता

जहां माता ही निकली कुमाता।।

इंजीनियर राजन सोनी

अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश

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