नारी का जीवन
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नारी की है अजब कहानी
अवसादों की हो या हो उत्पीड़न की, हर कड़ी लंबी चली,
तिल तिल घुटती रही ,
कर्म और कर्तव्य की चक्की में पिसती रही,
जीवन बीत गया पर
अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रही, नारी का जीवन बना दुस्वपन:
हर पग पर अपने आप से जूझती रही,
हर कदम पर जीवन के इम्तिहान देती रही,
संस्कृति और साहित्य में नारी सम्मानित होती रही,
समाज में पग-पग पर अपमानित होती रही ,
नर को बचाती रही धूप, सर्दी, दुख और हर संकट से,
हर मौसम में खुद अंगारों पर चलती रही ,
प्रश्न है कौन उभारेगा इसे ?
क्या इसकी स्थिति सुधर भी पाएगी? या जिस तरह 20 सदी गुजर गई, 21वी सदी भी भाषणों और कविताओं में ही गुजर जाएगी।
शिवदत्त डोंगरे भूतपूर्व सैनिक खंडवा