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माँ तेरी याद बहुत आती हैं।

मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।

❤️माँ मुझे बहुत याद आई।।

उसके एक कोने मे लगा था,

मेरे विद्यालय की गणवेश

का स्वेटर।

उसी से सटा के जुड़ा हुआ था,

मेरे भाई का वो कबड्डी

वाला नेकर।

जिसे पहन कर बड़ी भाव

खाती थी-

बहिन की वो फेवरेट वाली फ्रॉक,

क्या गजब की काम आई।

मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।

माँ मुझे बहुत याद आई।

दादी की वो लुगड़ी जिस पर

पत्तीदार गोटा था,

पापा का वो कोट जिसका

कपड़ा बड़ा मोटा था।

वो जिसका हम खेल खेल में

टेन्ट बना लेते थे,

वो चादर भी अलट पलट

कर थी लगाई।

मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।

माँ मुझे बहुत याद आई।

तकियों की खोली,

कमीज,पजामे,बनियान,मफलर।

मोजे,टोपे,टाई,

रुमाल,तौलिया,टी शर्ट भर भर।

सबको सलीके,स्नेह,

समर्पण के रंग बिरंगे

धागों से जोड़ा,

और अपनी सबसे सुन्दर साड़ी,

कवर बनाकर चढ़ाई।

मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।

माँ मुझे बहुत याद आई।

उसने पुरानी ख़ुशियों से नई

ख़ुशी जीने की अनमोल

कला थी सिखाई।

मैंने जब खोली गुदड़ी की तुरपाई।

माँ मुझे बहुत याद आई।

स्वरचित

Raju Dhakad✍️

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