
दूसरों को खुश करते-करते,
हर वक्त ये सोचते-सोचते कि
“कहीं मैं गलत तो नहीं कर रही…?”
कभी किसी की नाराज़गी का डर,
कभी किसी के चेहरे पर देखी उदासी का बोझ,
और मैं…
हर बार खुद को ही बदलती रही—
सिर्फ इसीलिए कि कोई मुझसे नाराज़ न हो जाए।
पर जितना बदलती गई,
उतनी ही खोती गई—
अपने ही भीतर की मैं।
और सच कहूँ तो…
लोग फिर भी खुश नहीं हुए।
उनके चेहरे का वही शिकन,
वही शिकायत—
मुझे आज समझ में आया
कि मैं खुद को मिटाकर भी सबको खुश नहीं रख सकती।
अब बस… बहुत हो गया।
अब और नहीं जीना दूसरों की उम्मीदों पर।
अब मैं सीखूँगी—
खुद को खुश रखना
क्योंकि ज़िंदगी एक ही बार मिलती है,
और इस बार…
मैं इसे अपने लिए जियूँगी।
मैं अपनी ख़ुशी की मालिक बनूँगी,
अपने दिल की सुनूँगी,
और अपनी रोशनी में जीना सीखूँगी।
क्योंकि आखिर में…
अगर मैं खुद के लिए नहीं खड़ी हुई,
तो कौन होगा मे
रे लिए?
💞𝓝𝓮𝓱𝓪 𝓖𝓸𝔂𝓪𝓵 💞