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हवेली का बुलावा

अमित पुरानी इमारतों की तस्वीरें खींचने का शौकीन था। इसी शौक में वह बीहड़ जंगल के बीच बनी 'रतनगढ़ की हवेली' पहुंच गया। गांव वालों ने चेतावनी दी थी कि जो भी सूरज ढलने के बाद वहां जाता है, कभी लौटकर नहीं आता। अमित ने उनकी बातों को हंसकर टाल दिया।

शाम के ६ बजे थे। हवेली का विशाल लकड़ी का दरवाज़ा सड़ चुका था। अमित अंदर गया और तस्वीरें लेने लगा। हवेली के बड़े हॉल में धूल जमी थी और दीवारों पर पुराने ज़माने के तैलचित्र (paintings) टंगे थे।

तभी अमित की नज़र एक बड़ी पेंटिंग पर पड़ी। उसमें एक सुंदर औरत लाल साड़ी पहने मुस्कुरा रही थी। उसकी आंखें इतनी सजीव थीं कि लग रहा था वह अमित को ही देख रही है।

अचानक, कैमरे का फ्लैश चमका और पूरी हवेली में सन्नाटा पसर गया। सूरज ढल चुका था।

अमित ने वापस जाने के लिए अपने कदम बढ़ाए, लेकिन तभी उसे किसी के पायल की छनछनाहट सुनाई दी।

"छन... छन... छन..."

आवाज़ ऊपर की मंज़िल से आ रही थी। अमित का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ हवा का झोंका होगा। वह मुख्य दरवाज़े की तरफ भागा, लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद हो चुका था। उसने पूरी ताकत से धक्का दिया, पर वह टस से मस नहीं हुआ।

तभी हवेली के सारे दीये खुद-ब-खुद जल उठे। रोशनी पीली और डरावनी थी।

अमित ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा। हॉल के बीचों-बीच वही लाल साड़ी वाली औरत खड़ी थी जो पेंटिंग में थी। लेकिन अब उसका चेहरा सुंदर नहीं था। उसकी त्वचा झुलसी हुई थी और उसकी बड़ी-बड़ी आंखें खून की तरह लाल थीं।

वह हवा में तैरते हुए अमित की तरफ बढ़ने लगी। उसके पैर उल्टे थे।

"तुम आ गए... मैं बरसों से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी," उसकी आवाज़ दीवारों से टकराकर गूंज रही थी।

अमित जान बचाने के लिए ऊपर की सीढ़ियों की तरफ भागा। वह एक कमरे में घुसा और दरवाज़ा बंद कर लिया। कमरा पूरी तरह अंधेरा था। उसने हांफते हुए जेब से फोन निकाला और उसकी टॉर्च जलाई।

जैसे ही टॉर्च की रोशनी सामने पड़ी, अमित की चीख गले में ही फंस गई।

उस कमरे की दीवारों पर सैकड़ों की संख्या में वही पेंटिंग्स टंगी थीं। और हर पेंटिंग में वह औरत नहीं थी... बल्कि उन लोगों की तस्वीरें थीं जो पहले इस हवेली में आए थे। उनके चेहरों पर भयानक दर्द और खौफ के भाव थे।

तभी अमित के फोन की टॉर्च खुद ही बंद हो गई। अंधेरे में उसे अपने ठीक पीछे किसी के सांस लेने की आवाज़ आई। एक बर्फीला ठंडा हाथ उसकी गर्दन पर आकर टिक गया।

अगले दिन, गांव का एक लड़का हवेली के पास से गुज़रा। उसने देखा कि हवेली के मुख्य हॉल में एक नई पेंटिंग टंगी थी। उस पेंटिंग में अमित था, जिसके चेहरे पर खौफ था और उसकी आंखें मदद के लिए चिल्ला रही थीं।

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