
जब तक कहानी सुनने की उम्र तक पहुँचा, नानी और दादी दोनों इस दुनिया से रुख़्सत हो चुकी थीं। सुना है कि जब इंसान बुढ़ापे की सरहदों को छूने लगता है, तो वह अपने माता-पिता की सांस्कृतिक गोद में पनाह लेना चाहता है। एक उम्र पर पहुँचकर इंसान तमाम अनुभवों से गुजर चुका होता है। ज़िंदगी सीधी रेखा में नहीं चलती, बल्कि यह एक दायरे की तरह घूमती रहती है। एक खास बिंदु पर पहुँचकर यह फिर थोड़ा पीछे लौटकर दायरे में चलने लगती है — एक ऐसा दायरा जिसका न कोई अंत है, न कोई आरंभ।
क्या कमाल की बात है!
ज़िंदगी की रंग-बिरंगी प्रकृति…
खैर।
जब हम पहली बार दुनिया को देखते हैं — मेरी उम्र के लोग अपनी आधी ज़िंदगी बीसवीं सदी में गुज़ार चुके हैं, उन्हें याद है कि गर्मी, सर्दी और बरसात के दिन कैसे होते थे और प्रकृति के क़रीब होने का क्या आलम था। एक ऐसी दुनिया, जहाँ तालाब, पोखर, नदियाँ और उनके किनारों की वनस्पतियाँ, पक्षी, चिड़ियाँ, ततैया और पेड़ों की छाया भी अपनी-सी लगती थीं। एक तरह का समग्र (holistic) वातावरण!
किस्से या कहानियाँ, जो रात में खासकर औरतें सुनाया करती थीं, वे हमारे मन को एक तरह की खुशी और आश्चर्य से भर देती थीं और हम नींद की आगोश में चले जाते थे।
फिर रेडियो के नाटक सुने गए, फिर टीवी आया और अब इंटरनेट का मायाजाल!
कल बच्चों के साथ हैरी पॉटर सीरीज़ की फ़िल्म देख रहा था। कोई दो-ढाई दशक पहले यही फ़िल्में अपने भाई के बच्चों के साथ जमशेदपुर में देखा करता था। अब वे बच्चे खुद माँ-बाप बन चुके हैं। जादू-टोने की ये फ़िल्में बच्चों में जिज्ञासा जगाती हैं — यानी बच्चों के लिए एक नई दुनिया बनाती हैं। एक ऐसी दुनिया जैसे:
Alice in Wonderland वाली दुनिया…
कृष्ण चंदर ने एक जगह लिखा है कि हम दुख उठा रहे हैं क्योंकि हम खेलना भूल गए हैं। “Plaything” नामक कविता में टैगोर ने कहा:
बच्चा एक टहनी से खेलता है और व्यापारी सेठ बड़े-बड़े बही-खातों (रजिस्टरों) से खेलता है!
शेक्सपियर ने कहा:
“All the world is a stage and men and women are mere players!”
इस ख़ाकसार को महसूस होता है कि बड़ी उम्र में हमारा मन यादों से इतना भर जाता है कि वह एक बोझ बन जाता है। इसका उपाय यह हो सकता है कि ‘मदरबोर्ड’ से अनावश्यक यादों को मिटा दिया जाए। इसका एक तरीका यह भी है कि नकारात्मक बातों को सकारात्मक में बदल दिया जाए, ताकि इस बोझ से मुक्त होकर हल्का हुआ जा सके और ज़िंदगी की नई शुरुआत संभव हो सके।
प्रकृति में एक ऐसी विशिष्टता है कि हर पत्ती का अपना अलग डिज़ाइन और आकार होता है। सृष्टिकर्ता ने किसी भी रचना को दोहराया नहीं है, यानी:
हर दिन नया दिन
और हर रात नई रात
अगर हम भी इस दोहराव से खुद को बचा सकें — इसके लिए ब्रह्मांड के नित नए गुणों को पहचानना ज़रूरी है। हर मौसम नई पत्तियों के साथ आता है।
अगर हम भी खुद को नया बना सकें, तभी हमारे सामने ज़िंदगी की खूबसूरती खुल सकती है, वरना ज़िंदगी एक असहनीय गतिविधि बनकर रह जाती है। ज़िंदगी की खूबसूरती उसके नए-नए पहलुओं में ही छिपी है — यानी सृजनशीलता के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है!
बच्चों के साथ झाड़ियों में जुगनू खोजिए,
दिल के मोआमलात में बचपन भी चाहिए।
— बशीर बद्र
आदाब अर्ज़
रुख़सार अहमद फारूकी
(गोंती वाला)
31/03/2026 ।