Back to feed

मेरे पापा की साइकिल

#स्वरचित

"मेरे पापा की साइकिल"

मेरे पापा की साइकिल दो पहियों की गाड़ी नहीं यादो का सागर थी l

उसके आगे की टोकरी या छोटी बेबी सीट पर बैठ निकली सवारी थी l

ना उसके गियर ना उसको पेट्रोल डीज़ल या गैस की कोई चाहत थी l

ट्रिनट्रिन बजाकर घंटी उसकी जब पापा बाहर से आते चेहरे खिलाती थी l

साइकिल की आवाज सुनते ही पापा को देख में जो दौड़ लगाती थी l

बैठ कर उसपर एक ही चक्कर लगवा दो एसी जिद में करती थी l

मुस्कुराकर बिठाते जब घूमने जाती सबको दिखा राजकुमारी सी इठलाती थी l

कुछ नहीं जिसके आगे महंगी गाड़ी मेरे पापा की वो साइकिल सबसे निराली थी l

जिस के साथ रेडियो की भी यारी थी साइकिल नहीं वो तो शाही सवारी थी l

आगे हैंडल पर लटका रेडियो जिसमें बजते गाने और ख़बरें

सफर के साथी थी l

उतरती चैन में काले होते हाथ पंचर टायर और पंचर वाले से भी उनकी यारी थी l

कितना सुकून था चारो तरफ धुएँ के प्रदूषण की कोई ना हिस्सेदारी थी l

हो जाता व्यायाम भी उससे ही नाअलग से कसरत करने की तैयारी थी l

सुबह खेतों में जाते खेतों की मेड़ और कच्ची पगडण्डियाँ की वो महारानी थी l

पापा की सच्ची साथी हर काम में आगे आती एसी दोनों की वो यारी थी l

पापा के साथ साथ उसको भी परिवार की जिम्मेदारी उठानी थी l

साइकिल वो हमारी जिससे जुड़ी कितनी यादें जीवन की वो कितनी प्यारी थी l

काजल मनीष जैन

राजस्थान

Baatcheet