
निश्चल प्रेम
जिसे नवाजा हर खुशियों से, वो ही दुख से मिला गया
कौन बचा इस धरती पर जो, अपनों से ना छला गया
राम रहे मर्यादित प्रति पल
उनको भी वनवास दे दिया
जनक नंदिनी मां सीता को
इस जग ने उपहास दे दिया
कपट मंथरा का कौशल्या के घर को क्यूं जला गया
कौन बचा इस धरती पर जो अपनों से ना छला गया
राधा ने बस प्रेम लुटाया
फिर राधा ही रोई क्यों है
प्रेम दिए यदि प्रेम ही मिलता
तो कान्हा को खोई क्यों है
रास रचा कर कृष्ण कन्हैया राधा को क्यूं भुला गया
कौन बचा इस धरती पर जो अपनों से ना छला गया
हम ने जिस पर जान लुटाई
उसने केवल दुख लौटाया
जीवन के हर कठिन छोर पर
खुद को महज अकेला पाया
जिसे हंसाया हर कीमत पर बस वो ही क्यूं रूला गया
कौन बचा इस धरती पर जो अपनों से ना छला गया