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खूबसूरत शाम

खूबसूरत शाम

नाराज़गी की भी कोई ख़ूबसूरत शाम होने दो,

उल्फ़त को मोहब्बत का मुकम्मल अंजाम होने दो।

इससे–उससे, जाने किस–किस से मिले हैं रास्ते,

हर किसी से मुहब्बत का कोई नाम होने दो।

जो मिला है दर्द, उसे भी कोई पैग़ाम समझो,

हर एक ज़ख़्म को आज दिल का पैग़ाम होने दो।

बिछड़ कर भी जो महके, वही रिश्ता है असल,

यादों को भी कुछ लम्हों का अरमान होने दो।

हमने सीखा है सहना भी मुस्कुराकर यहाँ,

हर इक शिकवा–गिला अब बे-ज़ुबान होने दो।

“साहिल” तजुर्बों से ही मुकम्मल हुआ है इश्क़,

हर अंजाम को आख़िर एक शाम होने दो ।।

© डॉ. राहुल शुक्ल साहिल

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