
"सैलरी? कैसी सैलरी बे?" ढाबे के मालिक मंगत राम ने बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुए कहा।
धीरज दंग रह गया, "साब, आपने तीन हजार रुपये महीना कहा था। मुझे माँ की दवाई के लिए गाँव पैसे भेजने हैं।"
मंगत राम हँसा और एक पुरानी डायरी निकाल लाया, "पहले दिन तूने जो चाय का जग तोड़ा था, उसके पाँच सौ। पूरे महीने जो यहाँ ठूँस-ठूँस कर रोटियाँ तोड़ी हैं, उसका राशन खर्च ढाई हजार। हिसाब बराबर! उल्टा तेरे ऊपर दो सौ रुपये उधार हैं। चुपचाप काम कर, नहीं तो पुलिस को बुलाकर चोरी के इल्जाम में अंदर करवा दूँगा।"
धीरज का खून खौल उठा। उसने मेहनत की थी, रात-रात भर जागकर जूठे बर्तन माँजे थे, और बदले में उसे यह मिला? उसने अपना बैग उठाया और वहाँ से भागने की कोशिश की, लेकिन मंगत राम के दो गुंडों ने उसे दबोच लिया। उन्होंने धीरज को बेरहमी से पीटा और उसका बैग छीनकर उसे सड़क पर फेंक दिया।
रात के दो बजे, दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में धीरज सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठा रो रहा था। उसके शरीर पर चोट के निशान थे और जेब में एक धेला भी नहीं था। भूख के मारे उसका पेट ऐंठ रहा था। उसे लगा कि वह आज रात यहीं दम तोड़ देगा।
तभी एक आलीशान मर्सिडीज कार उसके ठीक सामने आकर रुकी। कार का शीशा नीचे हुआ और अंदर से एक संभ्रांत, सूट-बूट पहने हुए व्यक्ति ने धीरज को देखा। उस व्यक्ति की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
"पहाड़ी लड़के, भूखे हो?" उस आदमी ने एक भारी आवाज में पूछा।
धीरज ने डरते हुए सिर हिलाया। उस आदमी ने कार का दरवाजा खोला, "अंदर बैठो। तुम्हें खाना भी मिलेगा और काम भी।"
धीरज को लगा कि भगवान ने उसकी सुन ली। वह बिना सोचे-समझे कार में बैठ गया। वह नहीं जानता था कि यह इंसान कोई मसीहा नहीं, बल्कि दिल्ली के अंडरवर्ल्ड का एक बड़ा मोहरा था, जो धीरज की मजबूरी का फायदा उठाकर उसे एक ऐसे दलदल में धकेलने वाला था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
आगे क्या हुआ?
क्या धीरज अपराध की दुनिया का हिस्सा बन गया? या उसकी पहाड़ी खुद्दारी ने उसे बचा लिया? जानने के लिए पढ़ें अगला भाग!
कार के अंदर बैठे शख्स का नाम विक्रम था, जो शहर में जमीनों के अवैध कब्जे और हवाला का कारोबार करता था। वह धीरज को अपने आलीशान बंगले पर ले गया। धीरज को खाना खिलाया गया और नए कपड़े दिए गए।
अगले दिन, विक्रम ने धीरज के सामने नोटों की एक गड्डी रखी। "यह पचास हजार रुपये हैं। इसे अपने गाँव भेज दो। बदले में तुम्हें बस एक छोटा सा काम करना है। शाम को कनाट प्लेस के एक होटल में यह बैग पहुँचाना है। याद रहे, बैग को खोलकर मत देखना।"
धीरज ने नोटों की तरफ देखा। इतनी रकम से उसकी माँ का इलाज अच्छे से हो सकता था। लेकिन जैसे ही उसने बैग को हाथ लगाया, उसे अपने स्वर्गीय पिता की कही एक बात याद आई: "धीरज, भूखे पेट सो जाना मंजूर करना, लेकिन बेईमानी की रोटी कभी मत खाना। पहाड़ के लोगों का सिर हमेशा ऊँचा रहना चाहिए।"
धीरज का हाथ ठिठक गया। उसने विक्रम की आँखों में देखा, जहाँ एक शिकारी की चमक थी। धीरज समझ गया कि इस बैग में कुछ ऐसा है जो उसे जिंदगी भर के लिए मुजरिम बना देगा।
"माफ़ करना साब, मैं यह काम नहीं कर सकता," धीरज ने नोटों की गड्डी वापस रखते हुए कहा।
विक्रम का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, "मेरी बात ठुकराने का अंजाम जानते हो?"
"जानता हूँ साब, लेकिन अपनी ईमानदारी नहीं बेच सकता," धीरज ने मजबूती से कहा और बंगले से बाहर निकल आया।
अब धीरज के पास न घर था, न पैसे। लेकिन इस बार उसका हौसला टूटा नहीं था। उसने फुटपाथ पर रहकर एक कंस्ट्रक्शन साइट पर दिहाड़ी मजदूरी शुरू की। दिन भर सीमेंट की बोरियाँ ढोने के बाद, वह रात को स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पुरानी फेंकी हुई किताबों से अंग्रेजी और कंप्यूटर के बेसिक्स सीखता था। उसकी इस लगन को साइट के सिविल इंजीनियर, मिस्टर शर्मा ने नोटिस किया।
शर्मा जी ने धीरज की प्रतिभा को पहचानकर उसे एक नाइट कॉलेज में दाखिला दिलवाया। अगले पाँच साल धीरज के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। वह दिन में 12 घंटे मजदूरी करता, शाम को कॉलेज जाता और रात को सिर्फ 3 घंटे सोता।
जानिए आगे क्या हुआ अगले भाग में।