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राजधानी की दुर्दशा

करते है लोग बुराई हमारे शहर की,

चलो देखें शान राजधानी शहर की।

चकाचौंध की चादर तनी,

पर सड़कों की साँसें मौन घनी।

शुद्ध हवा एक लंबी सांस,

ये हो गए यहां केवल आभास।

प्राचीनता को ओढ़े इतिहास खड़ा है,

दुर्गंध में लिपटी राजधानी पड़ी है।

नदियाँ जो जीवनधारा थीं कभी,

आज नालों में बदलकर लज्जित खड़ी हैं।

सरकारी भवन दमक रहे,

जन-मन भ्रम में भटक रहे।

न सफाई, न स्वच्छता का हाल,

कचरे की माला से हर स्थल विहाल।

कहते हैं - राजधानी होती है मिसाल,

पर दमघोंटू है इसका वर्तमान काल।

वादों के महल ऊँचे-ऊँचे खड़े हैं,

नींव मगर खोखली है, सपने टूटे पड़े हैं।

खोटी होती जाती भव्यता,

अपनों ने ही छीनी सभ्यता।

दोष अकेला तंत्र का नहीं है यहाँ,

हर नागरिक से भी प्रश्न उठता है जहां।

लालच की धौंस में विवेक मर गया है,

स्वार्थ के हाथों शहर बिखर गया है।

समझे हर जन यह बात,

आदतों से ही बदलें हालात।

राजधानी देश की पहचान है,

नागरिकों में ही उसकी जान है।

जो बदलना है,आदतों से प्रारंभ करो,

स्वच्छता को व्यवहार में रूपांतरित करो।

आओ कुछ कदम हम आगे बढ़ाए,

कुछ उत्तरदायित्व शासन भी निभाए।

कुछ तुम करो, कुछ शासन का प्रयास,

आओ मिलकर करें परिवर्तन का शिलान्यास।

कूड़े पर बैठ शिकायत करना,

अपने घर का कूड़ा भी तो है हरना।

नागरिक जागें तो शहर सँवरेगा,

चरित्र जागे तो राष्ट्र निखरेगा।

जो परिवर्तन चाहिए समाज में,

शुरुआत करनी होगी अपने ही काज में।

पराई नहीं यह राजधानी हमारी है,

यह पूरे देश की पहचान न्यारी है।

निवासियो, अब बदलना होगा,

राजधानी को श्रेष्ठ करना होगा।

राजधानी भवन नहीं, चरित्र का आईना है,

तंत्र से पहले मनुष्य का मुआइना है।

स्वार्थ से ऊपर उठना होगा,

अपने शहर को श्रेष्ठ बनाना होगा।

बनारसी बिगाड़े हालात है राजधानी के

तुम्हे अपने देश को सर्वश्रेष्ठ करना होगा।

जो बदलना है तो आदतों से शुरुआत करो,

देश वही श्रेष्ठ जहाँ नागरिक जाग्रत नगीना है।

लेखक - बनारसी

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