
ट्रेन की सीटी गूंजीं जब,
चिड़ियों की चहक दी सुनाई।
मानो नई कहानी बुनता हो AI ।
सबकी अपनी राह थी।
घर अपने सब चल दिये थे।
मन को मेरे कईं सवाल घेरें थे।
हम तो जाते घर अपने,
फिर पंक्षी यहां क्यूं बैठे थे ?
घर यही इनका था?
या हमने कब्जा कर लिया था।
विकास की अंधी दौड़ में,
इनका घर हर लिया था?
मनुष्य हुआ क्यों निर्दयी इतना,
जंगल- जंगल का जाता है?
विकास किसके लिये है इतना,
क्यो विनाश किये जाता है?
उनकी मधुर चहचहाहट में ,
मै गुहार सुन सकता हूं।
दु:ख से कुमलित उनकी मै,
पुकार सुन सकता हूं।
हे मानव अब रुक जा ।
आग्रह तुझसे हमारा है।
अन्धकार से तेरा जीवन,
नहीं निकल पा रहा है।
अन्तत:
मानव की मानसिकता ना हो
और अधिक विस्मित
"अति सर्वत्र वर्जित"
"अति सर्वत्र वर्जित"
"अति सर्वत्र वर्जित"
कृपा शुक्ल ✍️✍️
दिनांक 12/11/2025