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दृश्य टुंडला स्टेशन उत्तर प्रदेश

ट्रेन की सीटी गूंजीं जब,

चिड़ियों की चहक दी सुनाई।

मानो नई कहानी बुनता हो AI ।

सबकी अपनी राह थी।

घर अपने सब चल दिये थे।

मन को मेरे कईं सवाल घेरें थे।

हम तो जाते घर अपने,

फिर पंक्षी यहां क्यूं बैठे थे ?

 

घर यही इनका था?

या हमने कब्जा कर लिया था।

विकास की अंधी दौड़ में,

इनका घर हर लिया था?

मनुष्य हुआ क्यों निर्दयी इतना,

जंगल- जंगल का जाता है?

विकास किसके लिये है इतना,

क्यो विनाश किये जाता है?

उनकी मधुर चहचहाहट में ,

मै गुहार सुन सकता हूं।

दु:ख से कुमलित उनकी मै,

पुकार सुन सकता हूं।

हे मानव अब रुक जा ।

आग्रह तुझसे हमारा है।

अन्धकार से तेरा जीवन,

नहीं निकल पा रहा है।

अन्तत:

          मानव की मानसिकता ना हो

          और अधिक विस्मित

     

       "अति सर्वत्र वर्जित"

        "अति सर्वत्र वर्जित"

         "अति सर्वत्र वर्जित"

कृपा शुक्ल ✍️✍️

दिनांक 12/11/2025

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