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ज्ञान और विद्वता की भव्यता

मैने हमेशा तथ्यों, अनुभवों और आदर्शों पर बात की है। आज मन है एक क़िस्सा सुनाने का, तो चलिए शुरू करते हैं।

यह क़िस्सा है मेरे बचपन का। मैं शायद 10 साल की थी, प्राइमरी की किसी कक्षा में पढ़ती थी, सटीक याद नहीं। एक दिन एक हेलीकॉप्टर की आवाज़ सुनी, तो अनायास ही कक्षा के बाहर जाकर आसमान की ओर देखने लगी। बचपन का रोमांच होता है न, जैसे ही आसमान में कोई आवाज़ सुनाई दे, दौड़कर बाहर की ओर भागते हैं। हालांकि टीचर से बहुत डांट पड़ी, मगर उस खुशी के आगे टीचर की डांट का कोई दुःख नहीं था।

फिर मैंने अपनी दोस्त से पूछा, "आज इस हेलीकॉप्टर में कौन आया है? क्योंकि यह एकदम नज़दीक था, यहीं कहीं उतरा होगा।"

मेरी दोस्त एक नंबर की ख़बरी थी, उसे सब पता था। झट से उसने बताया कि कोठी वाले राजा और राजकुमार आए हैं, कोई पूजा है।

अब मेरे मन में उन्हें देखने की हलचल मच गई। फिल्मों में ही राजाओं और राजकुमारों को देखा था। फिर इंटरवल में हिम्मत करके स्कूल से निकल गए और सीधे बड़े तालाब के किनारे वाले मंदिर के बाहर पहुँच गए।

इंतज़ार करते रहे राजकुमार का। पूजा खत्म हुई, राजपरिवार बाहर निकला। मेरे तो जैसे सारे ख़्वाब, सारे अरमान और सारा रोमांच पल भर में फीका पड़ गया। वे सब सफेद कुर्ते-पायजामे में थे, बिल्कुल वैसे ही, जैसे मेरे पापा पहनते थे।

उदास मन लेकर घर आ गए। अम्मी से जाकर बताया, "अम्मी, आज राजकुमार और राजा को देखा, वे लोग हम जैसे ही कपड़े पहने थे।"

अम्मी हँसने लगीं और कहा, "अरे, वह सब पुराने ज़माने में होता था। अब राजशाही खत्म है, अब सरकार है। जो लोग राजपरिवार से थे, वे भी अब आम लोगों की तरह रहते हैं। मगर एक खास बात है, वे बहुत पढ़े-लिखे हैं, विदेश से पढ़कर आए हैं।"

बस, फिर क्या था, एक बात मेरे मन में बैठ गई: सादगी के साथ यदि विद्वत्ता और ज्ञान की भव्यता हो, तो सम्मान और लोकप्रियता अपने आप बढ़ जाती है।

यह बात मैंने गांठ बाँध ली और इसी को अपना आदर्श बना लिया। फिर जहाँ-जहाँ ऐसी मिसालें मिलीं, मेरे इरादे और पक्के होते गए। बाहरी आकर्षण और बनावट से उकताहट होने लगी। लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ एक, विद्वान बनना, ज्ञान को गहराई से अपने अंदर उतारना। कभी ध्यान ही नहीं दिया कि अच्छा दिखना भी ज़रूरी होता है।

दुनिया बहुत बदल गई है, कितना विकास, कितनी तरक्की हो गई; मगर एक चीज़ नहीं बदली, अच्छा दिखने की ख्वाहिश।

पहले लोग मन मसोस कर रह जाते थे, क्योंकि उतने साधन नहीं थे। थे भी तो सबकी पहुँच में नहीं थे। इंटरनेट की क्रांति ने सब बदलकर रख दिया, इतने साधन और संसाधन हैं कि अब काया ही बदल जाती है। और न भी बदले, तो कैमरे का लेंस आपको सौंदर्य की मलिका या देवताओं जैसा सुंदरतम रूप दे सकता है।

हमारी यह इच्छा इतनी विकराल होती जा रही है कि हम अपने स्वास्थ्य से अधिक आकर्षण को प्राथमिकता देने लगे हैं। वास्तव में हम अंदर से खोखले हो चुके हों, दवाइयों पर चल रहे हों, मानसिक स्थिति बिखर चुकी हो, आर्थिक परिस्थिति दयनीय हो, फिर भी हम कैमरे में आकर्षक दिखने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं।

विडंबना देखिए, पूरी दुनिया में भव्यता और आकर्षण को इतनी ऊँचाई मिल गई है कि उसके लिए लोग कुछ भी अनर्गल, अस्वाभाविक और अप्राकृतिक करने को तैयार हैं। और समाज के हर प्रतिष्ठित और गरिमामयी स्तंभ, चाहे वह मीडिया हो, सिनेमा हो, राजनीति हो, यहाँ तक कि शिक्षा जगत, सबका झुकाव भी इसी ओर है।

अब आदर्शों की सरलता और सहजता के लिए न तो जगह बची है, न ही कोई छोटा सा कोना, जहाँ कुछ लोग अपने मूल्यों के साथ सांस ले सकें।

ऐसे में साधारण लोग जाएँ तो कहाँ जाएँ? उन्हें रहना तो इन्हीं के बीच है, पर वे परिहास का पात्र बन जाते हैं। फिर यही साधारण लोग विलुप्त होकर अपनी एक अलग दुनिया बना लेते हैं, जहाँ किताबें हैं, आदर्श हैं, दर्शन है और मूल्य हैं। वे उसी गुफा में बैठकर लोगों की मूर्खता पर मौन शोक मनाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अंततः इस भव्यता और आकर्षण का शोक अकेले ही मनाना पड़ेगा, जहाँ उनका साथ देने कोई नहीं आएगा।

हम साधारण, सरल लोगों के पास भी बहुत कुछ है। हमारी अंदर की दुनिया इतनी समृद्ध है कि हमें किसी बाहरी आडंबर की ज़रा भी आवश्यकता नहीं।

तथाकथित आधुनिकता की इस दौड़ में, इस अनंत भीड़ से खुद को अलग कर लेना आसान नहीं। यह साहस बड़े त्याग के बाद आता है, और जब आता है, तो व्यक्ति को इतना धनी, सशक्त और सामर्थ्यवान बना देता है कि फिर कोई भी कमजोरी उसे पराजित या बेबस नहीं कर पाती।

@अर्शिया अंजुम

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