“आख़िरी ख़त… पर अपने नाम”
आख़िर मान ही लिया मैंने,
कि हम साथ नहीं चल पाएंगे…
कितना भी चाहा समझना,
हम एक-दूसरे को समझ नहीं पाएंगे।
शुक्रिया तुम्हारा—
मोहब्बत का मतलब सिखाने के लिए,
और उसी मोहब्बत में
खुद को खो देने का एहसास दिलाने के लिए।
अब मैं थोड़ा दूर जा रहा हूँ,
शायद मेरी दूरी तुम्हें सुकून दे,
शायद मेरी खामोशी
अब तुम्हारे लिए जवाब बन जाए।
हमने जो ख्वाब बुने थे,
वो अधूरे ही सही…
पर मैंने कोशिश पूरी की थी,
ये सुकून रहेगा कहीं।
तुम्हारी कमी आज भी चुभती है,
पर अब ये दर्द मेरा अपना है,
मैं इसे संभाल लूंगा…
क्योंकि अब मैं खुद का भी तो सपना हूँ।
ये आख़िरी ख़त तुम्हारे लिए नहीं,
शायद मेरे अपने दिल के नाम है…
जहाँ अलविदा तुम्हें नहीं,
मैं अपने पुराने खुद को कह रहा हूँ।
👉सीख (Moral):
हर रिश्ते का अंत हार नहीं होता,
कभी-कभी दूर जाना ही
खुद को वापस पाने की शुरुआत होता है।