
ये घनघोर घटाएं कब तक है
ये अंधियारे भी कब तक है
है अधरों पे मुस्कान नहीं
जीवन में कोई प्यास नई
माना पग पग पर काँटे है
उपवन भी फूल से वंचित है
इस अमावस में चाँदनी का कुछ पता नहीं
सुखी ज़मीन है बरसात का कुछ पता नहीं
विपदा आन पड़ी है भारी
दुनिया भर के आडंबर से मन विचलित है
सूखे मन की तृष्णा को बुझाए कैसे?
जीवन को ज्योति को जलाए कैसे?
एक दिन दरिया का रुख मोड़ेंगे
एक दिन दरिया का रुख मोड़ेंगे
समंदर से नाता तोड़ेंगे
खुशियों के दीप जलाएंगे
जीवन की प्यास बुझाएंगे
भोर में हम मुस्कायेंगे
मनमीत संग गुनगुनाएंगे
उपवन में फूल भी बरसेंगे
कलियों पर शबनम बरसेगी
आगंतुक खुशबू लाएंगे
नए सवेरे की खातिर
हम रात की फांस को झेलेंगे
भोर की ऊषा तकने को
हम स्याह रात में जागेंगे
हम पर फेंके हर पत्थर को
हम सीढ़ी नई बना लेंगे
अंधियारों से लड़कर
हम जुगनू मंज़िल पा लेंगे..!
अधर : होंठ; आडंबर : दिखावा;
तृष्णा : प्यास; आगंतुक : अतिथि, पाहुन
Written by Naveen Gupta 🤗