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जाओ, तुम भी सो जाओ

آداب عرض

یہ رہی آپ کی تحریر کا ادبی / شاعرانہ ہندی ترجمہ:

जाओ, तुम भी सो जाओ

जाओ, तुम भी सो जाओ

अपनी क़ब्र में

या किसी दूसरी टूटी-फूटी, जो भी नज़र आए —

कब्रिस्तान में जगह की कोई कमी तो नहीं!

बात तो एक ही है —

ज़िंदों के मक़बरे हों या मुर्दों की बस्ती,

बात तो एक ही है!

नफ़रत बस्तियों को ग़रीबों के कब्रिस्तान में बदल देती है,

हिंसा इंसान को शैतान बना देती है!

तो क्या डरना चाहिए?

तो क्या लड़ना चाहिए?

तो क्या क़त्ल का बाज़ार सजे?

तो क्या तलवारों और भालों के जुलूस निकलें?

तो क्या जीने का टैक्स अदा हो?

तो क्या मरने का इंतज़ार किया जाए?

तो क्या मौत पर रोया जाए

या ज़िंदगी को खो दिया जाए?

उन्हें यह ज़िद है कि उन्हें ख़ुदा माना जाए,

उन्हें "ज़िल्ले-इलाही" के ख़िताब से नवाज़ा जाए,

उनके दरबार में सिजदा किया जाए,

उनकी जहालत को सलाम किया जाए —

उनका यह ख़ुदसाज़ ग़ुरूर,

कहीं उन्हें ही न तोड़ दे!

इंतज़ार करो —

नींद हावी हो रही है?

क्यों, कोई क़ब्र खाली नहीं की गई?

यह केंद्रीय विचार न्यायमूर्ति काटजू के उस बयान से लिया गया है,

जब उन्होंने कहा था कि हम अभी भी कृषि-सामंती व्यवस्था से बाहर नहीं आए हैं।

आदाब अर्ज़

रुख़सार अहमद फ़ारूक़ी

(गोंती वाला)

26/03/2026

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