
तुम्हें शायद कभी अंदाजा नहीं होगा कि मेरे भीतर कितना कुछ ऐसा था, जो सिर्फ तुम्हें कहा जाना था। शब्द थे, भाव थे, पूरे-पूरे वाक्य थे लेकिन सब वहीं रह गए, मेरे अंदर। समय गुजरता रहा और मैं हर बार सोचता रहा कि अगली बार कह दूंगा, मगर वह अगली बार कभी आया ही नहीं।
मैं तुम्हारी जिंदगी में कोई बड़ा दावा नहीं बनना चाहता था। मैं तो बस तुम्हारी आँखों का काजल बन जाना चाहता था। इतना करीब कि हर रोज तुम्हारी नजरों में जगह मिले और इतना अपना कि दिन के अंत में तुम्हारे साथ ही उतर जाऊँ।
मैं चाहता था कि उम्र का बढ़ना किसी दूर की तरह नहीं बल्कि एक साझा यात्रा की तरह हो, जहाँ बारिश आए तो हम साथ भीगें और धूप निकले तो एक-दूसरे की परछाई बन जाएँ।
कभी-कभी मेरा मन करता था कि जाते हुए बसंत और आते हुए पतझड़ के बीच, किसी साधारण सी शाम में, तुम्हारा हाथ थामकर बस इतना कह दूँ कि—मौसम का मिजाज चाहे जैसा भी हो, मैं हर मौसम तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ। मुझे किसी वादे की जरूरत नहीं थी, मुझे सिर्फ तुम्हारी हथेली की गर्माहट ही काफी लगेगी।
मैं अपनी कहानी में तुम्हें ऐसा किरदार बनाना चाहता था, जिसकी हिफाजत मेरे लिए किसी फर्ज से ज्यादा एक सहज प्रवृत्ति होती। ऐसा लगता था कि अगर उस हिफाजत में मेरी जान भी चली जाए तो भी कोई अफसोस नहीं होगा। क्योंकि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए जीने से ज्यादा उनके लिए खड़े रहना जरूरी लगता है, उनकी केयर करना जरूरी लगता है।
लेकिन धीरे-धीरे यह समझ आया कि हर कहानी हमारे हिस्से नहीं आती। कुछ रिश्ते सिर्फ हमें ये सिखाने के लिए होते हैं कि क्या कहा जा सकता था, क्या जिया जा सकता था। उनका अंत वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं और शायद होना भी नहीं चाहिए।
— दिनेश प्रजापति