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मुस्कानों के पीछे की खामोशी

मुस्कानों के पीछे की खामोशी

हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता,

हर हँसी में सुकून का बसेरा नहीं होता।

कुछ लोग दर्द को यूँ ओढ़ लेते हैं,

जैसे वो उनकी पहचान ही हो—

इतनी ख़ूबसूरती से छुपाते हैं जज़्बात,

कि कोई उनके टूटने का एहसास तक नहीं कर पाता।

वो सबसे ज़ोर से हँसते हैं,

सबसे जल्दी जवाब देते हैं,

और यूँ जताते हैं जैसे कुछ भी

उनके दिल को छू नहीं सकता…

मगर उस हँसी के पीछे,

कई अधूरी रातों की थकान है,

उलझे ख़्यालों का एक बेक़रार समंदर है,

और वो खामोश सिसकियाँ हैं—

जो किसी की नज़र में नहीं आतीं।

“मैं ठीक हूँ” कहना

उनकी आदत बन जाती है,

इतनी बार दोहराते हैं इसे

कि खुद भी सच मान बैठते हैं।

क्योंकि कभी-कभी…

एक झूठी मुस्कान पहन लेना आसान होता है,

बजाय इसके कि कोई समझाए—

बिना वजह भी दिल क्यों भारी हो जाता है।

मर्म (Moral):

हर मुस्कान के पीछे एक कहानी होती है—इसलिए लोगों को उनकी हँसी से नहीं, उनके एहसासों से समझने की कोशिश करो।

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