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वो ज़िंदगी जो मैं देखती हूँ

मैं एक ऐसी ज़िंदगी देखती हूँ…

जिसे हर कोई समझ नहीं पाता।

एक मंच…

रोशनी…

एक नाम…

जिसे लोग याद रखें…

सिर्फ मेरे दिखने के लिए नहीं—

बल्कि मेरे बनने के लिए।

मैं खुद को वहाँ देखती हूँ…

आत्मविश्वास के साथ खड़ी हुई…

जहाँ मेरी आवाज़ में मजबूती हो

और दिल में नरमी।

एक बेटी…

जिसने अपने माँ-बाप को गर्व महसूस कराया…

एक लड़की…

जिसने अपने सपनों को

हकीकत में बदला…

शायद ये सब बहुत ज़्यादा लगता है…

थोड़ा दूर…

थोड़ा सपनों जैसा…

पर कहीं न कहीं…

ये सब मेरे अंदर पहले से ही है।

और शायद…

यहीं से सब शुरू होता है।

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