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मौसम बदलते हैं

मौसम-ए-बहार रुख़्सत हो रहा है।

आमद-ए-गरमी का इस्तक़बाल करें।

आज ही गुलमोहर का पहला फूल देखा। अप्रैल में इन दरख़्तों पर लाल शोलों की तरह फूल लिपट जाते हैं। पत्तियाँ ग़ायब हो जाती हैं—सिर्फ़ फूल ही फूल… मगर इन्हीं दिनों गर्मी का शबाब भी होता है, और यह शबाब-ए-आलम-ताब बेहद जानलेवा होता है!

अप्रैल, मई और जून—लगातार तीन महीनों के बाद जुलाई का मौसम आएगा। मगर ये तीन महीने जिस्म में शायद यूरेनियम जैसी भरपूर ऊर्जा का इज़ाफ़ा करते होंगे—यह एक ख़याल है (आप असहमत हो सकते हैं)। इंसान जिस्म, ज़ेहन और रूह का एक अजीब-ओ-ग़रीब इम्तिज़ाज है, जिसके बारे में कोई अंतिम फ़ैसला करना, दरअसल, नादानी ही है। अगर हम अपने जहल को पहचान लें, तो यही बड़ी दानिशमंदी होगी।

अगर हम अपनी ज़िंदगी का ग़ैर-जानिबदार तजज़िया करें, तो इस नतीजे पर पहुँचेंगे कि जो हादसे, जो वाक़िआत और जो हालात एक उम्र में पेश आते हैं, उनमें बजाहिर कोई तार्किक राब्ता नहीं होता, न ही कोई मुकम्मल पैटर्न समझ में आता है। फ़ानी का शेर:

एक मुअम्मा है समझने का, न समझाने का

ज़िंदगी क्या है, ख़्वाब है दीवाने का।

उम्र की इस मंज़िल पर आ पहुँचा हूँ, जहाँ से—न चाहते हुए भी—पीछे मुड़कर देखने को जी चाहता है। मौसमों के सफ़र तय करते हुए वे मुक़ाम भी याद आते हैं, जहाँ ज़िंदगी गुज़री। लोग याद आते हैं। वे उतार-चढ़ाव याद आते हैं, जिनके तहत तश्कील-ए-हयात हुई। तजज़िया करना या न करना—एक-सा ही है। जो जिया गया, जैसे जिया गया—सब अतीत में तब्दील हो चुका। कोई पछतावा, कोई अफ़सोस—कार-ए-अबस के सिवा कुछ नहीं।

रिश्तों के ताने-बाने और उनकी गिरहें—सब मामूली बातें हैं। किसी शायर ने कहा:

किस पे गुज़री न शब-ए-हिज्र क़यामत की तरह,

फ़र्क़ इतना है कि हमने सुख़न-आराई की।

हम-आप ज़िंदगी की अलिफ़-लैला के किरदार ही तो हैं। हम इस रंगमंच पर अपनी मर्ज़ी से तो आए नहीं हैं—तो फिर सूद-ओ-ज़ियाँ का हिसाब ही क्या!

आदाब अर्ज़

रुखसार अहमद फारुकी

(इलाहाबाद से)

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