कितनी मुश्किलें हो, माँ का चेहरा याद आता है,
हमेशा ही दुआओं का, वो पहरा याद आता है।
झुर्रियों से भरा वो खुरदरा सा, जग से न्यारा हाथ,
मुलायम गालों पे मेरे, वो पसरा, याद आता है।
आसमाँ का परिन्दों से, गुलों का जो है गुलशन से,
वो ही तो रिश्ता मेरा, माँ से गहरा, याद आता है।
भले ही हो गये हम, बड़े यूँ उम्र से अब तो,
सामने माँ के, वो ही नाज़ो-नखरा, याद आता है।
कहाँ मैके की वो गलियाँ, वो सखियाँ राधा और नूरी,
भीगे मौसम में, झूलों संग वो बदरा, याद आता है।
शाम ढलने से पहले, लौट आना कहती थी तब माँ,
जवाँ खुद की हुई बिटिया, वो ख़तरा याद आता है।
वो आँगन नीम का सूना, जहाँ बाबा की थी कुर्सी,
वहीं पे तन्हा माँ का वक़्त ठहरा, याद आता है।
माँ की वीराँ ज़िन्दगी में उदासी का धुँआ और दर्द,
खिली बगिया बनी क्यूँ आज, सहरा, याद आता है।।
डॉ शकुंतला सरूपरिया
उदयपुर-राजस्थान