
ओ, वह बीत गया,
सब कुछ बीत जाएगा।
हर घाव भर जाएगा।
रेलगाड़ी पीछे छोड़ जाएगी
सारे दृश्य अंधेरे में,
पंख लगाकर उड़ जाएगी—
कोई उस पक्षी को पकड़ नहीं सकता।
उसे उड़ना ही है,
लुप्त हो जाने के लिए।
हम भी बढ़ेंगे
एक अज्ञात मंज़िल की ओर।
दृश्य विलीन हो जाएँगे,
अनंत में खो जाएँगे।
हम कहाँ जा रहे हैं?
बाल सफ़ेद हो रहे हैं,
शरीर दिन-प्रतिदिन बूढ़ा होता जाता है।
हमारी मंज़िल कहाँ है?
कहाँ जाना है?
बहुत सा काम अभी बाकी है—
सोचेंगे बाद में।
पहले निभा लें
अपने रोज़मर्रा के काम,
फिर अवकाश में
सोचेंगे उन बातों पर।
रुखसार अहमद फारूकी