
जीवन में संयम और नियम दो महत्वपूर्ण गुण हैं ; जो साधना से मिलते हैं। निरंतर कष्ट और यातना से ही इनको साधा जा सकता है। यूं तो वैराग्य से यह दोनों सरलता से व्यक्ति का आचरण बन सकते हैं मगर लोगों के समीप,,रिश्तों के मध्य इन को साधना अत्यंत दुष्कर है। कभी ऐसा हो कि कोई आकर आपकी आलोचना कर दे, अपमानित कर दे तो ऐसी परिस्थिति में कैसे संयम बरता जा सकता है? कैसे शांत चित्त से विचार कर , प्रतिक्रिया देने न देने का निर्णय किया जा सकता है ? वास्तव में अगर अपनी भावनाओं पर संपूर्ण नियंत्रण रखकर व्यक्ति संयम और शांति से स्वयं की आलोचना और अपमान का उत्तर दे सकता है तो वह ही संयमित है । ऐसे शांत चित्त ,संयमित जीवन जीने की कला ,स्वयं को समझने का साहस ओर न जाने कितना ज्ञान किताबों से मिलता है।
पुस्तकें आपको बहुत कुछ सिखा सकती हैं। स्वयं को जानने में बहुत सहायक होती हैं।आत्म चिंतन और आत्म विश्लेषण का मार्ग प्रशस्त करती हैं , लेकिन संयम तो साधते - साधते ही सधेगा।अभ्यास करते करते ही आएगा।
@अर्शिया अंजुम