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सोने की कलम का आखिरी सच

सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो। कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब बुरा सोचना भी नहीं था। बुरा सोचती तो बुरा सच हो जाता। एक दिन बच्ची बोली भूख लगी है। सुनीता ने सोचा खाना आ जाए। खाना आ गया। एक आदमी बोला जमीन चली गई। सुनीता ने सोचा जमीन वापस आ जाए। जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे मंदिर चमत्कारी है। दूर से लोग आने लगे। एक अमीर आदमी आया बोला और अमीर बनना है। सुनीता ने सोचा लालच बुरी है। उसका लालच खत्म हो गया। वह दान करने लगा। रात को आंगन में सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सुनीता चढ़ने लगी। ऊपर दरवाजा था लिखा था ग्यारहवां तहखाना। अंदर औरत बैठी थी सफेद साड़ी में। हाथ में किताब थी। बोली मैं सरस्वती हूँ। विद्या की देवी। तुम्हारी लिखने की शक्ति मैंने दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। लिखो पर हर शब्द में प्यार होना चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। नीचे आकर आरती हो रही थी। आरती के बाद उसने लिखा आज सब खुश हैं। और सब खुश हो गए। रात को कागज मिला लिखा था सत्तावन हजार शब्द हुए हैं एक लाख तैंतीस हजार बाकी। सुनीता ने सोचा अगली कड़ी दस हजार शब्द की हो। सुबह आंगन में फिर बक्सा था। कड़ी 15 - सोने की कलम का आखिरी सच सुनीता सुबह उठी। आंगन में बक्सा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला। अंदर डायरी थी। डायरी में लिखा था सोने की कलम का एक और राज है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता डर गई। उसने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस। पूजा की किताबें। सीमा का डॉक्टर बनना। गरीब की बेटी ठीक होना। मोहन की नौकरी। भंडारा। सोने की बारिश। अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी बोली सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने सोचा मेरी प्यारी चीज डायरी है। उसने डायरी छोड़ दी। डायरी छोड़ते ही रोशनी निकली। आवाज आई तुमने त्याग किया। अब तुम्हें कलम की जरूरत नहीं। तुम जो सोचोगी सच होगा। सुनीता ने सोचा मंदिर में भीड़ हो। भीड़ आ गई। सोचा भंडारे में लड्डू बनें। लड्डू बन गए। सोचा कहानी हिट हो।

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