
पचास वर्ष बीत गए
स्मृतियों की पगडंडी पर
एक गाँव था।
कुओं में पानी लबालब भरा रहता,
और हाथ से बनी रस्सी के सहारे निकाला जाता।
पीने का पानी
मिट्टी के घड़ों में संजोया जाता था।
बारिशें खूब होती थीं,
आसमान इतना सूना नहीं था।
गलियाँ बाँहें फैलाए रहतीं,
बैलगाड़ियाँ हँसी-खुशी गुजरतीं।
मौलवी ही एकमात्र शिक्षक थे,
और वही संरक्षक भी!
कृषि ही संस्कृति का केंद्र थी।
मेहमान सादा होता,
मेज़बान उससे भी अधिक विनम्र।
नदी सूखी नहीं थी,
पेड़ प्रचुरता में खड़े थे।
बातचीत में बनावट कम थी,
मिलना-जुलना महँगा नहीं था।
यह सब था—
पचास वर्ष पहले।
सब कुछ हुआ करता था।
पर अब किसे परवाह है
कि पचास साल पहले क्या हुआ था!
रूखसार अहमद फारुकी
( गौती वाला ) .