Personal Story
इम्तेहान-ए-मंज़िल
जो बिन माँगे ही मिल जाए, तो क़दर कहाँ रह पाती है?बिना ठोकर के ऐ राही, शऊर (समझ) कहाँ आ पाती है?मुकम्मल होने की राहें, इतनी आसान नहीं होतीं,जो बिना लड़े ही मिल जाए, वो जीत कहाँ कहलाती है?तू कर सबर और बेसबर भी, इस इम्तेहान की दहलीज़ पर,कि मंज़िल की ...
Poetic_hu